“Deeming each thread torn from my hem a sacred relic, crowned in reverence stands every thorn of the wilderness.”
जंगल का हर काँटा मेरे दामन के हर एक धागे को तबर्रुक (पवित्र भेंट) मानकर, आदरपूर्वक अपने सिर पर बाँधे मौजूद है।
इश्क़ के सेहरा में भटकते हुए आशिक़ का दामन जब काँटों में उलझकर तार-तार हो जाता है, तो शायर इस मंज़र को एक बहुत पाकीज़ा और रूहानी नज़रिए से देखता है। यहाँ बयाबान का हर काँटा आशिक़ का दुश्मन नहीं, बल्कि उसका अक़ीदतमंद नज़र आता है, जिसने उसके फटे हुए लिबास के एक-एक धागे को मुक़द्दस तबर्रुक समझकर अपने सिर पर पगड़ी की तरह सजा लिया है। यह शेर आशिक़ की दीवानगी और ज़ख़्मों को तकलीफ़ के बजाय इज़्ज़त और बुज़ुर्गी का मर्तबा अता करता है।
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