जिस की तुझ को जुस्तुजू है वो तुझी में है 'ज़फ़र' ढूँडता फिर फिर के तो फिर जा-ब-जा क्या चीज़ है

“The one you seek resides within yourself, O Zafar; why wander then, searching endlessly from place to place?”

— बहादुर शाह ज़फ़र
अर्थ

ऐ ज़फ़र, जिसे तू तलाश कर रहा है वह तेरे अपने अंदर ही मौजूद है; फिर तू जगह-जगह भटक कर क्या ढूँढ रहा है?

विस्तार

ज़फ़र इस शेर में एक गहरी सूफ़ी सच्चाई को बड़ी सादगी से बयां करते हैं कि जिस ईश्वर या महबूब की तलाश में इंसान दर-दर भटकता है, वह कहीं बाहर नहीं बल्कि उसके अपने भीतर ही मौजूद है। जब वह असीम नूर तुम्हारे दिल में ही बसा है, तो फिर दुनिया भर में भटकने और परेशान होने का क्या मतलब? यह शेर हमें बाहर की बेमतलब तलाश को छोड़कर अपने दिल में झांकने और खुद को पहचानने का प्यार भरा पैगाम देता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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