ग़ज़ल
कोई महरम नहीं मिलता जहाँ में
کوئی محرم نہیں ملتا جہاں میں
यह ग़ज़ल दुनिया में किसी सच्चे हमराज़ और आत्मीय साथी के अभाव में उपजे गहरे अकेलेपन और दर्द को बयां करती है। बेबसी और क़ैद के आलम में शायर अपने दिल की दास्तान अपनी ज़ुबान में कहने की तड़प और भारी निराशा को अभिव्यक्त करता है।
Source: rekhta · HI
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अभी गीत नहीं
1
कोई महरम नहीं मिलता जहाँ में
मुझे कहना है कुछ अपनी ज़बाँ में
2
क़फ़स में जी नहीं लगता किसी तरह
लगा दो आग कोई आशियाँ में
3
कोई दिन बुल-हवस भी शाद हो लें
धरा क्या है इशारात-ए-निहाँ में
4
कहीं अंजाम आ पहुँचा वफ़ा का
घुला जाता हूँ अब के इम्तिहाँ में
5
नया है लीजिए जब नाम उस का
बहुत वुसअ'त है मेरी दास्ताँ में
6
दिल-ए-पुर-दर्द से कुछ काम लूँगा
अगर फ़ुर्सत मिली मुझ को जहाँ में
7
बहुत जी ख़ुश हुआ 'हाली' से मिल कर
अभी कुछ लोग बाक़ी हैं जहाँ में
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