ग़ज़ल

चर्ख़ से कुछ उमीद थी ही नहीं

چرخ سے کچھ امید تھی ہی نہیں
अकबर इलाहाबादी· Ghazal· 8 shers· radif: ही नहीं

यह ग़ज़ल संसार और नियति के प्रति विरक्ति, सादगी और व्यंग्यात्मक भाव को उजागर करती है। शायर ने किसी बड़ी उम्मीद, धार्मिक बहस या दिखावे की समझदारी से दूर रहकर अपने निष्कपट और बेपरवाह जीवन-दर्शन को प्रस्तुत किया है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
चर्ख़ से कुछ उमीद थी ही नहीं आरज़ू मैं ने कोई की ही नहीं
मुझे आसमान (या क़िस्मत) से कोई उम्मीद थी ही नहीं, और मैंने कभी कोई ख़्वाहिश की ही नहीं।
2
मज़हबी बहस मैं ने की ही नहीं फ़ालतू अक़्ल मुझ में थी ही नहीं
मैंने कभी धार्मिक बहस नहीं की क्योंकि मुझमें इसके लिए कोई फ़ालतू अक़्ल या अतिरिक्त बुद्धि थी ही नहीं।
3
चाहता था बहुत सी बातों को मगर अफ़्सोस अब वो जी ही नहीं
मैं कभी बहुत सी चीज़ों की ख़्वाहिश रखता था, लेकिन अफ़सोस कि अब वह दिल या चाहत ही बाक़ी नहीं रही।
4
जुरअत-ए-अर्ज़-ए-हाल क्या होती नज़र-ए-लुत्फ़ उस ने की ही नहीं
अपने दिल का हाल बयान करने की हिम्मत कैसे होती, जब महबूब ने कभी कृपा या प्यार भरी नज़र से देखा ही नहीं।
5
इस मुसीबत में दिल से क्या कहता कोई ऐसी मिसाल थी ही नहीं
इस मुसीबत में मैं अपने दिल से क्या कहता या उसे कैसे समझाता, क्योंकि तसल्ली देने के लिए पहले से ऐसी कोई मिसाल मौजूद ही नहीं थी।
6
आप क्या जानें क़द्र-ए-या-अल्लाह जब मुसीबत कोई पड़ी ही नहीं
जब आप पर कभी कोई मुसीबत आई ही नहीं, तो आप 'या अल्लाह' पुकारने की असली क़द्र और अहमियत क्या जानें।
7
शिर्क छोड़ा तो सब ने छोड़ दिया मेरी कोई सोसाइटी ही नहीं
जब मैंने शिर्क छोड़ दिया तो सबने मुझे अकेला छोड़ दिया, अब मेरा अपना कोई समाज या दायरा ही नहीं बचा।
8
पूछा 'अकबर' है आदमी कैसा हँस के बोले वो आदमी ही नहीं
जब किसी ने पूछा कि 'अकबर' कैसा इंसान है, तो उन्होंने हँसते हुए जवाब दिया कि वह तो आदमी ही नहीं है।
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