ग़ज़ल
अपनी गिरह से कुछ न मुझे आप दीजिए
اپنی گرہ سے کچھ نہ مجھے آپ دیجئے
यह व्यंग्यात्मक ग़ज़ल सस्ती लोकप्रियता और अख़बारों में नाम छपवाने की तीव्र लालसा पर तीखा कटाक्ष करती है। शायर ने हास्य और तंज़ के ज़रिए समाज के दिखावे और आत्म-प्रचार की खोखली मानसिकता को उजागर किया है।
Source: rekhta · HI
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1
अपनी गिरह से कुछ न मुझे आप दीजिए
अख़बार में तो नाम मिरा छाप दीजिए
आप मुझे अपनी जेब से कुछ मत दीजिए, बस अख़बार में मेरा नाम छाप दीजिए।
2
देखो जिसे वो पाइनियर ऑफ़िस में है डटा
बहर-ए-ख़ुदा मुझे भी कहीं छाप दीजिए
जिसे भी देखो वह पायनियर अख़बार के दफ़्तर में जमा बैठा है और कह रहा है कि ख़ुदा के वास्ते मुझे भी कहीं छाप दीजिए।
3
चश्म-ए-जहाँ से हालत-ए-असली छुपी नहीं
अख़बार में जो चाहिए वो छाप दीजिए
दुनिया की नज़रों से असली सच्चाई छुपी नहीं है, इसलिए अख़बार में जो चाहे वह छाप दीजिए।
4
दा'वा बहुत बड़ा है रियाज़ी में आप को
तूल-ए-शब-ए-फ़िराक़ को तो नाप दीजिए
अगर आपको गणित में अपनी महारत का बड़ा दावा है, तो ज़रा जुदाई की रात की लंबाई नाप कर दिखाइए।
5
सुनते नहीं हैं शैख़ नई रौशनी की बात
इंजन की उन के कान में अब भाप दीजिए
शैख़ साहब नए ज़माने (नई रोशनी) की बात नहीं सुनते, इसलिए अब उनके कान में इंजन की भाप छोड़नी चाहिए।
6
इस बुत के दर पे ग़ैर से 'अकबर' ने कह दिया
ज़र ही मैं देने लाया हूँ जान आप दीजिए
'अकबर' ने माशूक़ की चौखट पर रक़ीब से कह दिया कि मैं तो सिर्फ़ धन-दौलत देने आया हूँ, जान आप ही दे दीजिए।
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