Poet Stories · 7:10

The Voice of Empire: Mirza Ghalib

साम्राज्य की आवाज़

Mirza Ghalib

About this video

This explainer delves into the remarkable journey of Mirza Ghalib, a poet whose verses immortalized the turbulence of the Mughal Empire's final years. Born in Agra in 1797, Ghalib faced personal tragedies early in life, shaping his philosophical outlook and poetic voice. The video explores his rise in the Mughal court, where he was honored with prestigious titles and became the royal historian and mentor to Emperor Bahadur Shah Zafar. Amidst the empire's decline and the upheaval of 1857, Ghalib's poetry reflected both personal and collective sorrow. The episode examines Ghalib's linguistic duality, his preference for Persian poetry, and his revolutionary impact on Urdu literature, especially through his conversational prose style. His journey to Calcutta, prompted by financial hardship, exposed him to new literary horizons and inspired further innovation. The legacy of Ghalib is traced through his influence on later poets and the enduring relevance of his work in the modern world. This video is a tribute to the timeless voice of Mirza Ghalib, whose words continue to resonate across generations.

  • ◆Mirza Ghalib's poetry reflects the decline of the Mughal Empire.
  • ◆He experienced significant personal losses early in life.
  • ◆Ghalib was both a court poet and a pioneer of modern Urdu prose.
  • ◆His journey to Calcutta broadened his literary horizons.
  • ◆Ghalib's legacy bridges classical and modern Urdu literature.

Couplets in this video

क़ैद-ए-हयात और बंद-ए-ग़म, दोनों एक हैंमौत से पहले इंसान ग़म से नजात पाए क्यूँ?

Qaid-e-hayat aur band-e-gham, dono ek hainMaut se pehle insaan gham se najaat paaye kyun?

Life's prison and sorrow's bondage are the same; why should one be freed from sorrow before death?

— Mirza Ghalib
है मौजजन इक कुल्ज़ुम-ए-ख़ूँ काश यही होआता है अभी देखिए क्या क्या मिरे आगे

Hai maujzan ek kulzum-e-khoon kaash yahi hoAata hai abhi dekhiye kya kya mire aage

A sea of blood is surging—if only this were all; let us see what more awaits me.

— Mirza Ghalib
Read the transcript

इस explainer में आपका स्वागत है।

आज हम बात करने वाले हैं मिर्जा खालेब की।

एक ऐसी शांदार शक्सियत

जिनकी शायरी ने मुघल सल्तनत की

आखरी दिनों की एक एक तस्वीर को

अपने अलफाज में उखेर दिया।

तो चलिए इतिहास और शायरी के

स्थिल्चस्व सफर पर एक साथ चलते हैं।

शिरुवाद करने से पहले जल्दी से

आज के हमारे सफर के रोड में आप पर नज़र डाल लेते हैं।

उथलप उथल भरे दोर का शायर,

मुघल सामराज्य का पतन,

फारसी बनाम उर्दू शायरी,

कलकता का सफर,

अब जरा इस टाइम लाइन को देखिये।

ये दिल दहला देने वाला है कि गालिब ने

कितनी छूटी उम्र में अपनों को खो दिया।

सत्रा सो सतानवे में आगरा में जन्म हुआ,

लेकिन बच्पन में ही

अठारा सो तीन में पिता का साया उठ गया।

फिर अठारा सो चे में उने पालने वाले चाचा की भी

खाती से गिर कर मौत हो गई।

और सिर्फ तीरा साल की उम्र में,

अठारा सो दस में उनकी शादी हुई

और वो दिल्ली आ गए।

इतने कम वक्त में इतने बड़े जटके।

यही वो वक्त था जिसने उनके अंदर

दार्शनिक सवालों और एक गहरे दुक्की

नीव रखी। और यह बात

उनके इस मश्वूर शेर में बिल्कुल साबजा

लगती है। कैदे हयातो

बंदे गम। असल में दोनों

एक हैं। मौत से पहले आदमी

गम से नजात पाए क्यूं।

यानि जिन्दगी और दुख

दोनों एक ही चीज के दो नाम है।

यह शेर दिखाता है कैसे उनका

नीजी दर्द उनकी कला के साथ घुल मिल गया था।

उनके लिए तो जैसे यह

जिन्दगी एक लगातार चलने वाला संगर्ज थी

जो सिर्फ मौत के साथ ही खत्म हो सकती थी।

मुगल सामराज्य का पतन

एक हुकूमत की आखरी सांसे।

आये देखते हैं कि

कैसे उनका ये विक्ति का दुख

दिल्ली में मुगल दर्बार की ढलती हुई

यहाँ गोर करने वाली बात यह है कि

गालिब ने मुगल दर्बार में

बड़े-बड़े मुकाम हासिल किया।

1850 में उन्हें दबीरुल मुल्क

और नजमुद दौला जैसी शांदार उपाधियां मिली।

और 1854 में तो

वो खुद मुगल समराट बहादुर

शा जफर के उस्ताद बन गये।

साथ ही उन्होंने शाही इतिहासकार का काम भी किया।

लेकिन इन सब के बावजूद

वो हमेशा आर्थिक रूप से परिशान रहे

क्योंकि ये वो दौर था

जब सब कुछ तेजी से विखर रहा था

है मौजजन एक कुल्जमे

हूँ काश यही हो।

आता है अभी देखिये क्या क्या मिरे आगे।

1857 के घदर के वक्त

अपने खुद के दर्ध को

किनारे रखते हुए उन्होंने उस बरबादी को

आगाज पर उतारा। जरह सोचिये

उस वक्त उन्होंने क्या बीती हुगी जब उन्होंने

अपनी आखों के सामने

अपनी प्यारी दिल्ली के बाजारों और हवेलियों

को उजड़ते और उस शांदार शहर को

एक मिलिटरी कैम्प में बदलते देखा।

इसी उथलपुथल के दौर में उन्होंने अपना तखलोस

यानी पेन नेम बदल लिया।

शुरुवात में वो असद लिखते थे

जिसका मतलब होता है शेर

लेकिन बाद में उन्होंने घालिब नाम अपना लिया

जिसका मतलब है सबपरहावी

या सबसे श्रीष्ट

और सच कहें तो ये एक ऐसा नाम था

जो इतिहास में हमीशा के लिए गूजने वाला था

शायरी

फारसी बनाम उर्दू

भाशा का द्वैत

अब उस दिल्चस्प भाशाई विडम्बना की बात करते हैं

गालिब के पूरे करियर को एक अलग ही पहचान दी

आपको शायद ही जानकर हरानी हो

लेकिन गालिब ने खुद कहा था

मेरी फारसी शायरी देखें

ताकि आप कई रंगों की तस्वीरे देख सके

मेरे उर्दू संगरह को छोड़ दें

ये केवल एक खाका है

तो एक बड़ा सवाल ये उठता है कि

सदियों पुराने मुगल दरबारों की रिवायतों में

पला बड़ा एक शायर अचानक से

आधुने कुर्दू गधे का जनक कैसे बन गया

चलिए उस टर्निंग पॉंट की तरफ बढ़ते हैं

चलिए उस टर्निंग पॉंट की तरफ बढ़ते हैं

जिसने उनकी सोचने की तरीके को

पूरी तरह बदल दिया

कलक़ता का सफर

साहितिक शितिज काविस्तार

हुआ कुछ यूँ की अंग्रेजों ने

घालिब की पेंशन रोग दी

कलक़ता का सफर

साहितिक शितिज काविस्तार

हुआ कुछ यूँ की अंग्रेजों ने घालिब की पेंशन रोग दी

और इसी मजबूरी ने उन्हें दिल्ली से

बाहर एक बिल्कुल नई दुनिया में

कदम रखने पर मजबूर कर दिया

कैसे पेंशन रुखने की वज़ा

से उन्हें गवर्णा जनरल से अपील करने के लिए

कलक़ता तक का एक लंबा सफर तै करना पड़ा

लेकिन ये सिर्फ एक सरकारी काम नहीं रह गया

कलक़ता में उन्हें एक ऐसा जीवन

तो और खुले विचारों वाला साहित एक माहौल मिला

जो दिल्ली के दर्बारों से एक दम अलग था

इसी माहौल ने उन्हें सफर एक कलक़ता

और नई फारसी मस्नवियां लिखने के लिए प्रेरिद किया

ये उनके लिए कल्चरल अवेकरिंग थी

कलक़ता में रहते हुए

सिमला मार्किट की हवेली नंबर

133 उनका ठिकाना बनी

उनके मताबी की एक ऐसा शहर था

जो मौत को छोड़कर हर मर्स की दवा दे सकता था

उस दोर के उनके

खत पढ़कर साफ़ पता चलता है कि वो

कलक़ता के इंटिलेक्शल मौहल

और वहाँ के हुनहार लोगों के कितने बड़े फैन हो गए थे

आधुनिक उर्दू गध्य की शिरुवात

खतों को बोलना सिखाना

कलक़ता के सफर का असार

सिर्फ उनकी शायरी पर ही नहीं

गध्य यानि प्रोज लिखने के तरीके पर भी

बहुत गहराई से पड़ा

इस टेबल पर नज़र डालिये

गालिब से पहले उर्दू में खत लिखने का तरीका बहुती सजावटी

भारी भरकम और आपचारिक होता था

लेकिन गालिब ने इन पुराने

जटिल नियमों को बिल्कुल तोड़ दिया

उन्होंने खतों को एक बहुती आसान

समबाद आत्मक और कैश्वल अंदास दिया

यह बिल्कुल ऐसा था जैसे कोई आपसे

आमने सामने बैटकर बात कर रहा हो

उन्होंने खूद इस बारे में कितनी खोप्सुरद बात कही थी

मैनी वो अन्धाजे तहरीर ये जात क्या है

कि मुरासला को मुकालमा बना दिया है

हजार कोस्स से बहसद जबाने कालम

बाधे किया करो

मतलब, खत को उन्होँने एक बाजिआ (?)

इसी एक कदम ने आधुनिक और आसान उर्धु गर्दे की ठोस निवरती

एक अमर साहित्तिक विरासत

शास्त्रिय से आधुनिक तक

आये अब देखते हैं कि कैसे

गालिब की कलम ने इतिहास और आधुनिक

दौर के बीच एक शांदार पूल का काम किया

अगर हम उर्धु साहित्ते के सफर को देखें

तो अठारीवी सदी में मीर्दा की मीरने

जिस क्लासिकल शाहिरी की जजबाती

बुन्याद रखी थी उन्नीसीवी सदी में

गालिब ने उसी शाहिरी को अपनी समझ से

एक दार्शनिक उचाई दी

और ये सिलसला यहीं नहीं रुका

उनके इसी अलग अंदाज ने 20 वी सदी में

फिराग गोरकपुरी और 21 वी सदी में

एहमत फराज जैसे बड़े शाहिरों को प्रेड़ित किया

जिन्होंने रुमान्स को

इंकलाब की अवास के साथ मिला दिया

और स्क्रीन पर जो नमबर है

107 ये कोई मामुली आकड़ा नहीं है

साहितिक आलोचक डॉक्टर सुहिल बलोच के मताविक

ये उन उर्दू किताबों की

गिंती हैं जो सिर्फ और सिर्फ

गालिप की शाइरी के गहरे अर्थों को समझाने के लिए

आकड़ा ही अपने आप में इस बात का सुबूत है

कि उनका काम कितना गहरा और पेचीदा है

तो वो जाते जाते

ये सवाल सोचने पर मजबूर करता है

अगर मिर्जा गालिप के अलफाजों ने

एक ढलते हुए सामराज जी की

पूरी रूहू को पन्नों पर उतार दिया था

तो आज की शायरी

हमारी इस तेजी से बदलती दुनिया को कैसे समिठेगी

आज की सिक्स बीनर को

हम इसी सवाल के साथ यही रोकते हैं

गालिप की वो आवाज जो मुगलो की

आखरी शाम में गूँजी थी

साझ उड़ने के लिए बहुत पहुँच चुक्रिया

Keep learning