Ghazal Explained · 8:19

Ghalib's Koi Ummeed Bar Nahin Aati Explained

कोई उम्मीद बर नहीं आती

Mirza Ghalib

About this video

Mirza Ghalib’s 'Koi Ummeed Bar Nahin Aati' stands as one of the most poignant ghazals in Urdu literature, composed in 1847 amidst the collapse of the Mughal Empire and Ghalib’s own financial and personal struggles. This video offers a detailed explanation of the ghazal, exploring its context, intricate symbolism, and the profound sense of despair and exhaustion that pervades its verses. Each couplet is unpacked for its linguistic depth and emotional resonance, from the futility of hope to the certainty of death, the tension between faith and the heart, and the alienation from oneself. The video also discusses the ghazal’s musical journey and its place in popular culture, including renditions by legendary singers and its adaptation in film and television. Through this exploration, viewers gain insight into why Ghalib’s words continue to echo in the collective consciousness, capturing universal human emotions of longing, loss, and existential angst.

  • ◆Ghalib wrote this ghazal during immense personal and historical turmoil in 1847.
  • ◆The poem explores despair, the futility of hope, and the certainty of death.
  • ◆Symbolism includes exhaustion, alienation, and the tension between faith and the heart.
  • ◆The ghazal’s verses are widely quoted to express anxiety and insomnia even today.
  • ◆Its legacy continues through music, film, and even parody in popular culture.

Couplets in this video

कोई उम्मीद बर नहीं आतीकोई सूरत नजर नहीं आती

Koi ummeed bar nahin aatiKoi soorat nazar nahin aati

No hope comes to fruition, no solution is in sight.

— Mirza GhalibRead on Sukhan →
मौत का एक दिन मुअ'य्यन हैनींद क्यों रात भर नहीं आती

Maut ka ek din mu'ayyan haiNeend kyun raat bhar nahin aati

Death is certain, so why does sleep elude me all night?

— Mirza GhalibRead on Sukhan →
पहले आती थी हाल-ए-दिल पर हँसीअब किसी बात पर नहीं आती

Pehle aati thi haal-e-dil par hansiAb kisi baat par nahin aati

Earlier I could laugh at my own plight, now nothing makes me smile.

— Mirza Ghalib
जानता हूँ सवाब-ए-ताअत-ओ-जोहदपर तबीयत इधर नहीं आती

Jaanta hoon sawaab-e-ta'at-o-zohdPar tabiyat idhar nahin aati

I know the rewards of devotion, but my heart is not inclined that way.

— Mirza GhalibRead on Sukhan →
है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँवरना क्या बात कर नहीं आती

Hai kuch aisi hi baat jo chup hoonWarna kya baat kar nahin aati

There is a reason for my silence, otherwise I could speak too.

— Mirza GhalibRead on Sukhan →
क्यों न चीखूँ कि याद करते हैंमेरी आवाज़ गर नहीं आती

Kyoon na cheekhoon ki yaad karte hainMeri aawaaz gar nahin aati

Why not cry out when I am remembered, but my voice does not reach.

— Mirza GhalibRead on Sukhan →
दाग़-ए-दिल गर नज़र नहीं आताबू भी या चारागर नहीं आती

Daagh-e-dil gar nazar nahin aataBoo bhi ya charagar nahin aati

If you can't see the wound of my heart, you won't sense its pain either.

— Mirza GhalibRead on Sukhan →
हम वहाँ हैं जहाँ से हमको भीकुछ हमारी खबर नहीं आती

Hum wahan hain jahan se humko bhiKuch hamari khabar nahin aati

I am at a place where even I have no news of myself.

— Mirza GhalibRead on Sukhan →
मरते हैं आरज़ू में मरने कीमौत आती है, पर नहीं आती

Marte hain arzoo mein marne kiMaut aati hai par nahin aati

We die longing for death, but death does not truly come.

— Mirza GhalibRead on Sukhan →
काबा किस मुँह से जाओगे ग़ालिबशर्म तुमको मगर नहीं आती

Kaaba kis muh se jaaoge GhalibSharm tumko magar nahin aati

With what face will you go to the Kaaba, Ghalib? But you feel no shame.

— Mirza GhalibRead on Sukhan →
Read the transcript

क्या आपको कभी ऐसा लगा है कि आप किसी चीज का इंतिजार करते करते पूरी तरह ठक गए हूँ।

मिर्जा गालिब जिनों ने अपने साथ बच्चों को बच्चपन में ही खो दिया था।

उनकी ये घजल एक ऐसे ही घहरे दर्द और नाऊमीदी से जनम लेती है।

बात 1847 की है, मुगल सल्तनत बिखर रही थी और गालिब कर्ज में डूबे हुए थे।

11 मात्राओं वाली बहरे रमल मुसद्धस महजूफ की लै में लिखी ये घजल दीवाने गालिब की सबसे मशूर और दर्द भरी घजलों में से एक है।

कोई उम्मीद बर नहीं आती। कोई सूरत नजर नहीं आती।

इस शेर में बर आना का मतलब है पूरा होना या फलना और सूरत का अर्थ है कोई शक्ल, उपाय या रास्ता।

गालिब कहते हैं कि मेरी कोई भी आशा अपूरी नहीं होती और इस मुश्किल हालात से बाहा निकलने का मुझे कोई रास्ता या उपाय नजर नहीं आता।

यह शेर एक घहरी ठकावट का प्रतीख है। गालिब ने उमीद के सारे रास्ते आजमा लियें हैं और अब वो उस मकाम पर हैं जहां ना उमीदी ही उनके जीवन का इकलोता सच बन गई है।

मात का एक दिन मुएयन है। नींद क्यूं रात भर नहीं आती।

यहां एक खास लवज है मॉययन जिसका मतलब होता है तैशुदा, निष्चित या निर्धारित।

शायर सवाल करता है कि जब मौत का एक दिन पहले से ही तै है तो फिर इस चिंता में मुझे रात भर नींद क्यूं नहीं आती।

गालब यहां इंसानी फितरत के विरोदा भास पर सवाल उठाते हैं। जो चीज अटल है हम उसी से डर कर अपनी नींद गवा बैटते हैं।

आज भी पॉप कल्चर में एंग्जाइटी या अनिद्रा को बयां करने के लिए ये शेर सबसे ज़ादा इस्तमाल होता है।

गालब कहते हैं कि पहले मुझे अपनी इस बुरी हालत पर खुद ही हसी आ जाती थी। लेकिन अब मेरा दर्द इतना गहरा है कि किसी भी बात पर मुस्कुराने का मन नहीं करता।

यहां गाले बता रहे हैं कि उन्होंने अपना आखरी सहरा भी खो दिया है। खुद पर हसना एक बचाफ का तरीका था। अब दर्द इतना मुकंबल हो चुका है कि वो कड़वी हसी भी छिन गई है।

जानता हूं सवाबे तातो जोहत पर तबियत इधर नहीं आती।

सवाब का अर्थ है पुन्य और तातो जोहत का मतलब है इबादत और परहेशकारी यानि धार्मिक नियम। तबियत कहते हैं इंसान के मन या स्वभाव को।

मैं अच्छी तरह जानता हूं कि पूजा पाट और एबादत का क्या पुन्य है। लेकिन क्या करूं मेरा मन उस तरफ लगता ही नहीं।

ये शेर धर्म और दिल के बीच की कश्मकश है। गालिब धर्मिक नियमों का सम्मान करते हैं। उन्हें नकारते नहीं। पर वो दिखावे की इबादत नहीं कर सकते। जब उनका दिल ही वहां मौझूद नहीं हो।

है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ। वर्ना क्या बात कर नहीं आती। इस शेर में कोई मुश्किल लफस नहीं है। चुप और बात जैसे सादे अलफास से गालिब ने एक बहुत गहरी बात कह दी है। गालिब कहते हैं कि मैं अगर खामोश हूँ तो उसकी कोई बहुत

अलाध की गंभीरता की है। कोई ऐसा राज, कोई ऐसा दुख या कोई ऐसी मजबूरी है जिसे लफजों में बया करना शाहिट खतरना किया नामुंकिन है।

क्यूं न चीखूं कि याद करते हैं। मेरी आवाज कर नहीं आती।

यहां चीखों का मतलब है जोर से चिल्लाना या पुकारना। और गर, फारसी का शब्द है जिसका मतलब होता है अगर या यदी। मैं चीख कर क्यों न बताओं कि मुझे उनकी याद आ रही है। लेकिन मैं चुप हूं क्योंकि मुझे डर है कि मेरी आवाज उन तक पहु�

दागे दिल गर नजर नहीं आता। बु भी या चारागर नहीं आती।

दागे दिल यानी दिल का गहाउ। बु का अर्थ यहां महक या गंद से है। और चारागर कहते हैं इलाज करने वाले को यानी वैद या हकीम।

गालिब कहते हैं कि अगर मेरे दिल का छिपा हुआ जखम तुम्हें दिखाई नहीं देता, तो ऐ हकीम, तुम्हें उसकी महक भी महसूस नहीं हो सकती।

चारागर वो दुनिया है जो सिरिफ उपरी दर देखती है। गालिब कहते हैं कि उनके दुख में एक ट्राजिक खुबसूर्ती है, एक महक है, जिसे कोई आम वैद या दुनियादार इनसान नहीं समझ सकता।

हम वहाँ है, जहां से हमको भी कुछ हमारी खबर नहीं आती। इस शेर में खबर लवज एहम है, जिसका मतलब सिर्फ समाचार नहीं, बलकि अपनी सुद, बुद या जानकारी से है। हम दर्ध के एक ऐसे मकाम पर पहुँच गए हैं, जहां से हमें खुद अपनी ही कोई �

गालिब दुनिया से और खुद से इतने कट चुके हैं, कि अब उनका अपना वजूद भी उनके लिए अंजान हो गया है।

मरते हैं, आर्जू में मरने की, मौत आती है, पर नहीं आती।

आर्जू का मतलब है गहरी इच्छा, तमन्ना या लालसा।

हम मरने की चाहत में पल-पल मर रहे हैं, मौत करीब आती तो है, लेकिन असल में हमें गले नहीं लगा दी।

ये गालिब की जिंदगी का सबसे बड़ा सच था। साथ बच्चों को खोने के बाद उन्होंने अपनी पत्नी के भतीजे आरिफ को गोद लिया, पर वो भी अठारा साल की उम्र में चल बसा।

गालिब मौत की इंतजार में थे, पर मौत उन्हें मुक्ती नहीं दे रही थी। काबा किस मूसे जाओगे गालिब, शर्म तुमको मगर नहीं आती।

काबा मक्का का पवितर स्थल है, जहां मुसल्मान हज के लिए जाते हैं, और शर्म का मतलब है लाज या हया।

ए गालिब, तुम किस मूसे काबा जाओगे, इतने गुनाहों के बाद भी तुम्हें जरा सी भी शर्म नहीं आती।

मक्ते का ये शेर उर्दू शायरी का एक क्लासिक अन्दाज है, जहां शायर खुद पर ही तन्स कसता है। सारी उम्र दुनियादारी और गुनाहों में गुजारने के बाद खुदा का सामना करने की ये विडमना ही गालिब को महान बनाती है।

इस गजल के दस मेंसे अकसर तीन या पांच शेरी ही गाय जाते हैं। बेगम अखतर, लता मंगेशकर और आबिदा परवीन जैसी महान आवाजों ने इसे गा कर अमर कर दिया।

1949 की फिल्म अपना देश में पुष्पा हंस ने इसे गाया लेकिन इसे घर-घर तक पहुंचाया गुलजार साहब के 1988 के टीवी सीरियल मिर्जा गालिब ने जहां जगजीत सिंग की आवाज ने गालिब के संघर्ष को आम आदमी से जोड़ दिया।

ये गजल हमारी तहजीब में इतनी घहरी उतर चुकी है कि मश्वूर हास्य कवी इसमायल जरीफ ने इसकी पैरडी तक लिख डाली। बीवी जब तक घर नहीं आती, कोई उम्मीद बर नहीं आती। यही गालिब की जीत है। वो हमारे हर आंसू और हर हसी में जिंदा है।

Keep learning