ग़ज़ल
शराब-ए-शौक़ सें सरशार हैं हम
شراب شوق سیں سرشار ہیں ہم
यह ग़ज़ल प्रेम और दीवानगी की मदहोशी में डूबने की बदलती मानसिक और भावनात्मक अवस्थाओं को दर्शाती है। प्रेमी अपने महबूब के चंचल और दोहरे व्यवहार के बीच कभी आत्मविस्मृत तो कभी सजग, और कभी तृप्त तो कभी व्यथित महसूस करता है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
शराब-ए-शौक़ सें सरशार हैं हम
कभू बे-ख़ुद कभू हुशियार हैं हम
हम चाहत और तड़प की शराब से पूरी तरह मदहोश हैं, इसलिए कभी तो हम अपनी सुध-बुध खो बैठते हैं और कभी पूरी तरह होश में आ जाते हैं।
2
दो-रंगी सूँ तिरी ऐ सर्व-ए-रा'ना
कभू राज़ी कभू बेज़ार हैं हम
हे सुंदर प्रियतम, तुम्हारे बदलते स्वभाव और दोहरेपन के कारण हम कभी तुमसे प्रसन्न होते हैं तो कभी तंग आ जाते हैं।
3
तिरे तस्ख़ीर करने में सिरीजन
कभी नादाँ कभी अय्यार हैं हम
हे प्रिय, तुम्हें जीतने या वश में करने की कोशिश में हम कभी नादान और भोले बन जाते हैं तो कभी बेहद चालाक और धूर्त।
4
सनम तेरे नयन की आरज़ू में
कभू सालिम कभी बीमार हैं हम
हे प्रिय, तुम्हारी आँखों की चाहत में हम कभी भले-चंगे रहते हैं तो कभी बीमार पड़ जाते हैं।
5
'वली' वस्ल-ओ-जुदाई सूँ सजन की
कभू सहरा कभू गुलज़ार हैं हम
ऐ वली, महबूब के मिलन और जुदाई के कारण हमारी हालत ऐसी है कि हम कभी वीरान रेगिस्तान की तरह हो जाते हैं और कभी खिले हुए चमन की तरह।
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