'वली' वस्ल-ओ-जुदाई सूँ सजन की — वली दकनी

'वली' वस्ल-ओ-जुदाई सूँ सजन की कभू सहरा कभू गुलज़ार हैं हम

“O Wali, through union and parting with the beloved, sometimes a barren desert, sometimes a blooming garden are we.”

— वली दकनी

अर्थ

ऐ वली, महबूब के मिलन और जुदाई के कारण हमारी हालत ऐसी है कि हम कभी वीरान रेगिस्तान की तरह हो जाते हैं और कभी खिले हुए चमन की तरह।

विस्तार

वली दकनी इस शेर में इश्क़ के उतार-चढ़ाव और दिल की बदलती हुई कैफ़ियत को बहुत ख़ूबसूरती से बयां करते हैं। जब महबूब दूर होता है, तो ज़िंदगी एक सूने और बंजर सहरा यानी रेगिस्तान की तरह वीरान लगती है, लेकिन उसके मिलते ही वही दिल फूलों से महकता हुआ गुलज़ार बन जाता है। यह शेर दिखाता है कि एक आशिक़ की पूरी दुनिया और उसका वजूद सिर्फ़ महबूब के साथ या उसकी जुदाई से तय होता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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