ग़ज़ल

मैया मोहिं दाऊ बहुत खिझायो

میا موہیں داؤ بہت کھجھایو
सूरदास· Pad· 5 shers

इस पद में बालक कृष्ण अपनी माता यशोदा से बड़े भाई बलराम की बाल-सुलभ शिकायत करते हैं कि वे उन्हें चिढ़ाते हैं कि तुम यशोदा के सगे पुत्र नहीं बल्कि खरीदे हुए हो। इस बात से रुष्ट होकर कृष्ण खेलने जाने से मना कर देते हैं। सूरदास ने यहाँ बाल-हठ और वात्सल्य रस का अत्यंत सजीव व मनोहारी चित्रण किया है।

Source: Sankshipt Sursagar (Indian Press, 1924) · HI

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लिपि व अर्थ
1
मैया मोहिं दाऊ बहुत खिझायो । मोसों कहत मोलको लीनो तू जसुमति कब जायो ॥
बाल कृष्ण माता यशोदा से शिकायत करते हैं कि हे मैया, बड़े भाई दाऊ (बलराम) मुझे बहुत चिढ़ाते हैं; वे मुझसे कहते हैं कि तुझे खरीदकर लाया गया है, यशोदा ने तुझे कब जन्म दिया है।
2
कहा कहौ एहि रिसके मारे खेलन हौं नहिं जातु । पुनि पुनि कहत कौन है माता कोहै तुमरो तातु ॥
मैं क्या कहूँ, इसी गुस्से के कारण मैं खेलने नहीं जाता; वे बार-बार मुझसे पूछते हैं कि तुम्हारी माँ कौन है और तुम्हारे पिता कौन हैं।
3
गोरेनंद जसोदा गोरी तुम कत स्याम शरीर । चुटुकी दैदै हँसत ग्वाल सब सिखै देत बलवीर ॥
नंद बाबा गोरे हैं और यशोदा भी गोरी हैं, फिर तुम्हारा रंग सांवला क्यों है? बलराम के सिखाने पर सभी ग्वाल-बाल चुटकी बजा-बजाकर तुम्हारा मज़ाक उड़ाते हुए हंसते हैं।
4
तू मोही को मारन सीखी दाउहि कबहुँ न खीझै । मोहन को मुख रिस समेत लखि जसुमति सुनि सुनि रीझै ॥
श्रीकृष्ण माता यशोदा से उलाहना देते हुए कहते हैं कि तुमने केवल मुझे ही मारना सीखा है और दाऊ (बलराम) पर कभी क्रोध नहीं करतीं; मोहन के मुख पर गुस्सा देखकर और उनकी बातें सुनकर माता यशोदा मन ही मन मुदित होती हैं।
5
सुनहु कान्ह बलभद्र चबाई जनमतहीको धूत । सूर स्याम मो गोधनकी सौं हौं माता तू पूत ॥
हे कान्हा! सुनो, बलराम चुगलखोर और जन्म से ही धूर्त हैं। सूरदास कहते हैं कि यशोदा कहती हैं—हे श्याम, मुझे अपने गोधन की सौगंध है कि मैं ही तुम्हारी माता हूँ और तुम मेरे पुत्र हो।
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मैया मोहिं दाऊ बहुत खिझायो | Sukhan AI