तू मोही को मारन सीखी दाउहि कबहुँ न खीझै । मोहन को मुख रिस समेत लखि जसुमति सुनि सुनि रीझै ॥

“You have learned to chastise only me, while never venting anger upon Dau; beholding Mohan's face flushed with sweet indignation, Yashoda overflows with tender joy.”

— सूरदास
अर्थ

श्रीकृष्ण माता यशोदा से उलाहना देते हुए कहते हैं कि तुमने केवल मुझे ही मारना सीखा है और दाऊ (बलराम) पर कभी क्रोध नहीं करतीं; मोहन के मुख पर गुस्सा देखकर और उनकी बातें सुनकर माता यशोदा मन ही मन मुदित होती हैं।

विस्तार

बालक कृष्ण अपनी माँ यशोदा से रूठकर शिकायत करते हैं कि माँ, तुमने तो केवल मुझे ही डांटना और मारना सीखा है, बड़े भाई बलराम पर तुम कभी गुस्सा नहीं करतीं। नन्हे कान्हा के चेहरे पर इस भोले-भाले गुस्से को देखकर माता यशोदा नाराज होने के बजाय मन ही मन प्रसन्न होती हैं। बालक की इस नटखट और मासूम नाराजगी को सुनकर माँ का हृदय वात्सल्य और अपार प्रेम से भर जाता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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