ग़ज़ल
उस से तो और आग वो बेदर्द हो गया
اس سے تو اور آگ وہ بیدرد ہو گیا
Source: Deewan-e-Zauq (1923) · HI
गीत सुनें
1
उस से तो और आग वो बेदर्द हो गया
अब आह-ए-आतिशीन से भी दिल सर्द हो गया
उस आग से वह बेदर्द और भी सख़्तदिल हो गया; अब तो मेरी जलती हुई आहों से भी उसका दिल और ठंडा पड़ गया।
2
सीने में बुलहवस के भी था आबला मगर
नश्तर का नाम सुनते ही मुँह ज़र्द हो गया
बुलहवस (लालची) के सीने में भी छाला था, मगर नश्तर का नाम सुनते ही उसका मुँह पीला पड़ गया।
3
सौ बार मर के आशिक़-ए-जाँ-बाख़्ता तेरा
मरने को फिर खड़ा रू-ए-शश-नर्द हो गया
सौ बार मरकर भी तेरा जान गँवा देने वाला आशिक़, फिर से मरने के लिए छह पासों वाली बिसात के सामने आ खड़ा हुआ।
4
मजनून भी दश्त-गर्द था मानिंद-ए-गिर्द-बाद
जब ख़ाक उड़ाई हमने तो वो गर्द हो गया
मजनून भी बवंडर की तरह जंगल में भटकने वाला था; पर जब मैंने ख़ाक उड़ाई तो वह भी ख़ाक में मिलकर खो गया।
5
इस सैद-ए-तीर-ख़ुर्दा को तू ने किया न ज़ब्ह
आख़िर तड़प तड़प के यहीं सर्द हो गया
तीर से घायल इस शिकार को तूने ज़ब्ह नहीं किया, आख़िरकार यह तड़प-तड़प कर यहीं ठंडा (बेजान) हो गया।
6
वाँ रुख़ शगुफ़्तगी से गुल-ए-वर्द बन गया
याँ ग़म से रू-ए-ज़र्द गुल-ए-ज़र्द हो गया
वहाँ उसका चेहरा ख़ुशी और ताज़गी से खिलकर लाल गुलाब बन गया; यहाँ मेरा पीला चेहरा ग़म से पीला गुलाब हो गया।
7
पीर-ए-मुग़ाँ के पास वो दारू है जिस से ज़ौक़
नामर्द मर्द मर्द-ए-जवाँ शेर ओ हो गया
ऐ ज़ौक़, पीर-ए-मुग़ाँ के पास ऐसी शराब है जिससे नामर्द मर्द बन जाता है और मर्द जवान शेर हो जाता है।
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