पीर-ए-मुग़ाँ के पास वो दारू है जिस से ज़ौक़ — शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

पीर-ए-मुग़ाँ के पास वो दारू है जिस से ज़ौक़ नामर्द मर्द मर्द-ए-जवाँ शेर ओ हो गया

“With the old Magian priest there is such wine, O Zauq, that the coward turns man, the man a youthful lion grown.”

— शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

अर्थ

ऐ ज़ौक़, पीर-ए-मुग़ाँ के पास ऐसी शराब है जिससे नामर्द मर्द बन जाता है और मर्द जवान शेर हो जाता है।

विस्तार

ज़ौक़ कहते हैं कि मयख़ाने के बुज़ुर्ग, यानी पीर-ए-मुग़ाँ के पास एक ऐसी अनोखी शराब है, जिसका असर बेहद ज़बरदस्त है। इस शराब को पीते ही इंसान पूरी तरह बदल जाता है। जो कमज़ोर या हिम्मत से ख़ाली था, वही बहादुर और मज़बूत बन जाता है। कोई नौजवान इसे पीकर शेर जैसा दिलेर हो जाता है। ऊपर से यह शराब की बात लगती है, पर सूफ़ी परंपरा में पीर-ए-मुग़ाँ अक्सर आध्यात्मिक गुरु होता है, और शराब ईश्वर-प्रेम या भीतरी जागृति का प्रतीक। असल पैग़ाम यह है कि सही रहनुमाई और वह प्रेम की मस्ती किसी में भी छिपी ताक़त जगा देती है, डर को निडर जज़्बे में बदल देती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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