इस सैद-ए-तीर-ख़ुर्दा को तू ने किया न ज़ब्ह — शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
“This arrow-stricken prey you would not deign to slay— at last, writhing and writhing, cold it grew right here.”
अर्थ
तीर से घायल इस शिकार को तूने ज़ब्ह नहीं किया, आख़िरकार यह तड़प-तड़प कर यहीं ठंडा (बेजान) हो गया।
विस्तार
ज़रा सोचिए, एक पंछी तीर लगने से घायल होकर बेबस पड़ा है। शायर अपने महबूब से कहता है: तूने अपने तीर से इस शिकार को ज़ख़्मी तो कर दिया, मगर फिर उसे ज़ब्ह नहीं किया, यानी एक रहम भरी मौत भी न दी। तूने उसे तड़पने के लिए छोड़ दिया। और इसी तरह, तड़प-तड़प कर, दर्द में बिलखते हुए वह यहीं धीरे-धीरे ठंडा होकर मर गया। यह एक आशिक़ की फ़रियाद है। महबूब की एक नज़र ने दिल को घायल कर दिया, पर न मिलन दिया, न पूरी रिहाई। आशिक़ तड़पता रहा और इंतज़ार में घुलकर मरता रहा। इस बेरुख़ी में भी एक गहरी कोमलता छिपी है।
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