मजनून भी दश्त-गर्द था मानिंद-ए-गिर्द-बाद — शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
“Majnun too roamed the wilderness, like a whirling column of dust; but when I kicked up the dust myself, he dissolved into dust and was lost.”
अर्थ
मजनून भी बवंडर की तरह जंगल में भटकने वाला था; पर जब मैंने ख़ाक उड़ाई तो वह भी ख़ाक में मिलकर खो गया।
विस्तार
शायर उस मशहूर आशिक़ मजनून को याद करता है, जो बवंडर की तरह रेगिस्तान में भटकता और जहाँ जाता वहाँ धूल उड़ाता था। उसका इश्क़ बेचैन और बेपनाह था। पर शायर कहता है कि मैंने उसे भी पीछे छोड़ दिया। जब मैंने इश्क़ और तड़प की धूल उड़ाई, तो खुद मजनून मेरे रास्ते की धूल बनकर रह गया। यह एक गर्व भरी, शरारती बात है। शायर कहना चाहता है कि उसका प्यार मजनून से भी गहरा और जंगली है, इतना कि दीवानगी का सबसे बड़ा प्रतीक भी उसके आगे छोटा पड़ जाता है। इसमें हँसी भी है और एक सच्ची पीड़ा भी।
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