ग़ज़ल
किसी बेकस को उसे बेदाद-गर मारा तो क्या मारा
کسی بیکس کو اسے بیداد گر مارا تو کیا مارا
Source: Deewan-e-Zauq (1923) · HI
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1
किसी बेकस को उसे बेदाद-गर मारा तो क्या मारा
जो आप ही मर रहा हो उसको गर मारा तो क्या मारा
अगर किसी अत्याचारी ने किसी बेबस को मार दिया तो इसमें क्या बड़ी बात है? जो पहले से ही मर रहा हो, उसे मार देने में कौन सी बहादुरी है?
2
बड़े मूज़ी को मारा नफ़्स-ए-अम्मारा को गर मारा
निहंग ओ अज़दहा ओ शेर-ए-नर मारा तो क्या मारा
यदि तुमने बड़े दुष्ट यानी पाप की ओर उकसाने वाले नफ़्स को मार डाला, तो तुमने सबसे बड़े शत्रु को मारा। पर अगर तुमने सिर्फ़ मगरमच्छ, अजगर या नर शेर को मारा, तो इसमें क्या बड़ी बात है?
3
न मारा आपको जो ख़ाक हो इक्सीर बन जाता
अगर पारे को ऐ इक्सीर-गर मारा तो क्या मारा
तुमने अपने आप (नफ़्स) को नहीं मारा, वरना जो ख़ाक थी वह भी इक्सीर बन जाती; ऐ कीमियागर, अगर तुमने सिर्फ़ पारे को मारा तो इसमें क्या बड़ी बात की?
4
ख़ता तह-ए-दिल की थी क़ातिल बहुत सी मार खाईकी
तेरी ज़ुल्फ़ों ने मुश्कें बांधकर मारा तो क्या मारा
दिल की गहराई में ही ख़ता थी, ऐ क़ातिल, और इसके लिए मैंने बहुत मार खाई; जब तेरी ज़ुल्फ़ों ने मेरी बाँहें बाँधकर मुझे मारा तो इसमें कौन सी बड़ी बात थी।
5
नहीं वो क़ौल का सच्चा हमेशा क़ौल दे देकर
जो उसने हाथ मेरे हाथ पर मारा तो क्या मारा
वह अपने वचन का सच्चा नहीं है, हमेशा वादे करता रहता है; तो जब उसने मेरे हाथ पर हाथ मारकर क़सम खाई, तो उस क़सम का क्या मतलब रहा?
6
तुफ़ंग ओ तीर तो ज़ाहिर न था कुछ पास क़ातिल के
उसी फिर जो दिल पर ताक कर मारा तो क्या मारा
क़ातिल के पास न तो बंदूक़ दिखाई दे रही थी और न तीर; फिर उसने निशाना साधकर जो दिल पर वार किया, तो क्या ही ख़ूब वार किया।
7
हंसी के साथ यां रोना है मिस्ल-ए-क़ुलक़ुल-ए-मीना
किसी ने क़हक़हा उसने बख़ैर मारा तो क्या मारा
यहाँ हँसी के साथ रोना भी है, जैसे सुराही के गले से शराब निकलने की आवाज़ (क़ुलक़ुल)। अगर किसी ने ठहाका लगाया और वह अच्छे से निभ गया, तो इसमें कौन सी बड़ी बात है।
8
मेरे आंसू हमेशा हैं ब-रंग-ए-लाल ग़र्क़-ए-ख़ून
जो ग़ोता आब में तू ने गुहर मारा तो क्या मारा
मेरे आंसू हमेशा लाल रंग के और खून में डूबे रहते हैं, तो अगर तूने पानी में गोता लगाकर कोई मोती निकाल लिया तो इसमें क्या बड़ी बात है।
9
जिगर ज़ख़्मी है और दिल लोटता है तुमने क्या जाना
इधर मारा तो क्या मारा उधर मारा तो क्या मारा
मेरा जिगर ज़ख़्मी है और दिल तड़प रहा है, तुमने यह कभी न जाना। चाहे इधर वार किया या उधर, उस वार का क्या महत्व।
10
दिल-ए-संगीन-ए-ख़ुसरौ पर भी ज़र्ब-ए-कोहकन पहुंची
अगर तेशा सर-ए-कोहसार पर मारा तो क्या मारा
ख़ुसरौ के पत्थर जैसे कठोर दिल पर भी कोहकन (फ़रहाद) की चोट पहुंच गई; अगर उसने तेशे से पहाड़ की चोटी पर वार किया तो उसमें क्या बड़ी बात थी।
11
क्या शैतान मारा एक सज्दे के न करने में
अगर लाखों बरस सज्दे में सर मारा तो क्या मारा
एक सज्दा न करने से शैतान का क्या बिगड़ा? अगर वह लाखों बरस सज्दे में सिर झुकाए रहता तो भी इसका क्या महत्व होता?
12
दिल-ए-बद-ख़्वाह में था मारना या चश्म-ए-बद-बीन में
फ़लक पर ज़ौक़ तीर-ए-आह गर मारा तो क्या मारा
मारना तो बुरा चाहने वाले के दिल में या बुरी नज़र वाली आँख में चाहिए था; ऐ ज़ौक़, अगर आह का तीर आसमान पर चला दिया तो क्या मारा, कुछ भी नहीं।
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