तुफ़ंग ओ तीर तो ज़ाहिर न था कुछ पास क़ातिल के — शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
“No musket, no arrow was visibly borne by the slayer's hand; That glance he took, aiming straight at my heart—what a shot he struck!”
अर्थ
क़ातिल के पास न तो बंदूक़ दिखाई दे रही थी और न तीर; फिर उसने निशाना साधकर जो दिल पर वार किया, तो क्या ही ख़ूब वार किया।
विस्तार
शायर कहते हैं कि उनके क़ातिल, यानी महबूब के पास न कोई बंदूक़ दिखी, न तीर, कोई ज़ाहिर हथियार ही नहीं था। फिर इसमें कौन सी बड़ी बात हुई? अगर उसने निशाना साधकर सीधे दिल पर वार किया, तो इसमें कैसी बहादुरी? जो दिल पहले से ही आशिक़, बेबस और खुला पड़ा हो, उसे मारना तो बेहद आसान है। यहाँ प्यारी सी शिकायत और शरारत छिपी है। असली कमाल तो किसी संभले हुए, मुक़ाबला करते दिल को जीतने में होता। पर जो दिल पहले ही सब कुछ हार चुका हो, उस पर वार करके फ़ख़्र करना क्या? यह शेर महबूब को छेड़ता है और साथ ही आशिक़ के समर्पण को भी उजागर करता है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
ऑडियो
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
