ग़ज़ल

देख मोहन तिरी कमर की तरफ़

دیکھ موہن تری کمر کی طرف
शाकिर नाजी· Ghazal· 7 shers· radif: की तरफ़

यह ग़ज़ल महबूब के अनुपम सौंदर्य और शारीरिक आकर्षण की पारंपरिक शैली में की गई भावपूर्ण प्रशंसा है। शायर ने अतिशयोक्ति और शास्त्रीय उपमाओं के ज़रिये माशूक़ की नाज़ुक कमर और शीरीं लबों की मिठास को बेमिसाल बताया है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
देख मोहन तिरी कमर की तरफ़ फिर गया मानी अपने घर की तरफ़
हे मोहन, तुम्हारी कमर की तरफ देखकर अर्थ (मानी) भी विवश होकर अपने घर वापस लौट गया।
2
जिन ने देखे तिरे लब-ए-शीरीं नज़र उस की नहीं शकर की तरफ़
जिस किसी ने तुम्हारे मीठे होंठ देख लिए हैं, उसकी नज़र फिर कभी शक्कर की तरफ नहीं जाती।
3
है मुहाल उन का दाम में आना दिल है माइल बुताँ का ज़र की तरफ़
उनका जाल में फँसना नामुमकिन है, क्योंकि इन महबूबों का दिल सिर्फ़ दौलत की तरफ़ आकर्षित होता है।
4
तेरे रुख़्सार की सफ़ाई देख चश्म दाना की नईं गुहर की तरफ़
तुम्हारे गालों की चमक और साफ़-सुथरापन देखकर किसी समझदार व्यक्ति की नज़र मोती की तरफ़ नहीं जाती।
5
हैं ख़ुशामद-तलब सब अहल-ए-दुवल ग़ौर करते नईं हुनर की तरफ़
सभी दौलतमंद लोग केवल चापलूसी चाहते हैं; वे हुनर या प्रतिभा की ओर बिल्कुल ध्यान नहीं देते हैं।
6
माह-रू ने सफ़र किया है जिधर दिल मिरा है उसी नगर की तरफ़
चाँद जैसे चेहरे वाले महबूब ने जिस ओर सफ़र किया है, मेरा दिल भी उसी शहर की तरफ़ लगा हुआ है।
7
हश्र में पाक-बाज़ है 'नाजी' बद-अमल जाएँगे सक़र की तरफ़
क़यामत के दिन 'नाजी' पाक-साफ़ और बेगुनाह साबित होगा, जबकि बुरे कर्म करने वाले लोग जहन्नुम (सक़र) की ओर भेजे जाएँगे।
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