ग़ज़ल

गर ग़ैर की गहर-से न दिल-आराम निकलता

گر غیر کی گہرسی نہ دل آرام نکلتا

Source: Kulliyat-e-Momin (old lithograph edition) · HI

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
गर ग़ैर की गहर-से न दिल-आराम निकलता दम का ही को यूँ ऐ दिल-ए-नाकाम निकलता
अगर रक़ीब के आलिंगन से दिल का सुकून न निकलता, तो ऐ नाकाम दिल, तू एक ही दम में निकल जाता।
2
मैं हम से मरता हूँ हाँ अब से उसकी क़ासिद की ज़बान से नहीं पैग़ाम निकलता
मैं उसकी चाहत में तड़प-तड़प कर मरता हूँ, पर क़ासिद की ज़बान से उसका कोई पैग़ाम नहीं निकलता।
3
करती जो मुझे याद शब-ए-वस्ल-ए-अदू तुम क्या सुब्ह को ख़ुर्शीद न ता शाम निकलता
अगर तुमने मुझे मेरे प्रतिद्वंद्वी के साथ मिलन की उस रात याद किया होता, तो क्या सुबह सूरज न निकलता और शाम तक न चमकता?
4
जब जानशी तासीर कि दुश्मन भी वहाँ-से अपनी तरह ऐ गर्दिश-ए-अय्याम निकलता
तब तू असर को जान पाता, ऐ ज़माने की गर्दिश, अगर तेरा दुश्मन भी मेरी तरह उस जगह से निकलता।
5
हर इक सिली वस बज़्म में शब पूछती थी नाम था लुत्फ़ जो कोई मेरा हम-नाम निकलता
रात की हर महफ़िल में हर कोई मेरा नाम पूछता था; कितना आनंद होता था जब कोई मेरे ही नाम वाला व्यक्ति सामने आता।
6
क्यों काम तलब है मेरी ज़ारी गर उन अकाम से देखा है कहीं काम निकलता
मेरी गिड़गिड़ाहट उनसे कामना का फल क्यों माँगे—भला किसी ने निष्क्रिय व्यक्ति से कोई काम पूरा होते देखा है?
7
थी नौहा-ज़नी दिल की जनाज़ा पे ज़रूरी शायद कि वो घबरा के सर-ए-बाम निकलता हो
दिल के जनाज़े पर ज़ोर-ज़ोर से रोना-पीटना ज़रूरी था, शायद वह घबरा कर छत के किनारे निकल आती।
8
काँटा सा खटकता है कलेजे में नसीम-ए-सहर यह ख़ार नहीं दिल से गुल-अंदाम निकलता
भोर की हवा काँटे की तरह कलेजे में चुभती है; यह काँटा नहीं, बल्कि कोई गुल-अंदाम महबूब दिल से निकल रहा है।
9
हूरें नहीं मोमिन की नसीबो नमें जो होतें तंजानी ही से क्यों यह बद-अंजाम निकलता
यदि मोमिन के भाग्य में हूरें लिखी ही न होतीं, तो महज़ ताने-तंज़ से ऐसा बुरा अंजाम क्यों निकलता।
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