हूरें नहीं मोमिन की नसीबो नमें जो होतें — मोमिन ख़ाँ मोमिन

हूरें नहीं मोमिन की नसीबो नमें जो होतें तंजानी ही से क्यों यह बद-अंजाम निकलता

“Had the houris not been written in the believer's fate at all, why would such a wretched end emerge from mere mockery alone?”

— मोमिन ख़ाँ मोमिन

अर्थ

यदि मोमिन के भाग्य में हूरें लिखी ही न होतीं, तो महज़ ताने-तंज़ से ऐसा बुरा अंजाम क्यों निकलता।

विस्तार

यह शेर नसीब और इनाम पर हल्के-फुल्के अंदाज़ में सवाल उठाता है। अगर जन्नत की हूरें सचमुच मोमिन के नसीब में लिखी होतीं, तो आख़िरकार अंजाम इतना बुरा क्यों निकलता? शायर मानो उन वादों पर नरमी से शक जताते हैं जो ईमान और उसके इनाम के बारे में हमें बताए जाते हैं। इसमें एक मीठी तंज़ और कोमल संदेह छिपा है। अगर नेक लोगों के नसीब में सचमुच ऐसी नेमतें होतीं, तो अंत इतना ख़राब कैसे होता? यह चुपके से सोचने पर मजबूर करता है कि इनाम और सज़ा की कहानियाँ हमेशा हक़ीक़त से मेल खाती हैं या नहीं।

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