थी नौहा-ज़नी दिल की जनाज़ा पे ज़रूरी — मोमिन ख़ाँ मोमिन

थी नौहा-ज़नी दिल की जनाज़ा पे ज़रूरी शायद कि वो घबरा के सर-ए-बाम निकलता हो

“Mourning aloud was needful at my heart's funeral— perhaps, alarmed, she'd step out to the edge of her balcony.”

— मोमिन ख़ाँ मोमिन

अर्थ

दिल के जनाज़े पर ज़ोर-ज़ोर से रोना-पीटना ज़रूरी था, शायद वह घबरा कर छत के किनारे निकल आती।

विस्तार

शायर अपने दिल के जनाज़े की कल्पना करता है और कहता है कि उस पर ज़ोर-ज़ोर से रोना-पीटना बहुत ज़रूरी था। क्यों? क्योंकि शायद वह आवाज़ सुनकर उसकी महबूबा घबरा जाए और छत के किनारे निकल आए, यह देखने कि आख़िर हो क्या रहा है। इसमें एक नर्म, दर्द भरी चतुराई है। मरते दम भी आशिक़ की एक ही तमन्ना है, महबूब की एक झलक और मिल जाए। ग़म सच्चा है, पर साथ ही यह एक बहाना भी है, उसे बाहर बुलाने की ख़ामोश तरकीब। यह दिखाता है कि इश्क़ हर चीज़ को, यहाँ तक कि दुख और विदाई को भी, महबूब को देखने का एक और मौक़ा बना देता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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