ग़ज़ल
ये 'मीर'-ए-सितम-कुश्ता किसू वक़्त जवाँ था
ये 'मीर'-ए-सितम-कुश्ता किसू वक़्त जवाँ था
यह ग़ज़ल एक ऐसे व्यक्ति का वर्णन करती है जो कभी 'सितम-कुश्ता मीर' के नाम से जाना जाता था, लेकिन अतीत में वह एक युवा और जीवंत व्यक्तित्व था। यह बताता है कि उसके बोलने का अंदाज़ और उसकी शायरी में एक अलग ही आकर्षण था। ग़ज़ल का सार यह है कि उसका जीवन और उसका प्रभाव किसी बड़े उथल-पुथल या तूफान जैसा था।
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1
ये 'मीर'-ए-सितम-कुश्ता किसू वक़्त जवाँ था
अंदाज़-ए-सुख़न का सबब शोर ओ फ़ुग़ाँ था
हे 'मीर-ए-सितम-कुश्ता', तू कभी युवा था, इसलिए तेरे काव्य-अंदाज़ के कारण बहुत शोर और दुःख हुआ।
2
जादू की पुड़ी पर्चा-ए-अबयात था उस का
मुँह तकिए ग़ज़ल पढ़ते अजब सेहर-बयाँ था
उसका मुँह जादू की पुड़ी जैसा पर्चा था जिसमें वो अजब सेहर-बयाँ ग़ज़लें पढ़ता था।
3
जिस राह से वो दिल-ज़दा दिल्ली में निकलता
साथ उस के क़यामत का सा हंगामा रवाँ था
वह रास्ता जिससे दिल का प्रेमी दिल्ली से निकला, उस रास्ते पर कयामत जैसा हंगामा चल रहा था।
4
अफ़्सुर्दा न था ऐसा कि जूँ आब-ज़दा ख़ाक
आँधी थी बला था कोई आशोब-ए-जहाँ था
अफ़्सुर्दा न था ऐसा कि जूँ आब-ज़दा ख़ाक
आँधी थी बला था कोई आशोब-ए-जहाँ था
अर्थात, मेरा दिल इतना टूटा नहीं था कि वह जल से उपजी धूल भी झेल सके; बल्कि वहाँ कोई प्रचंड, दुनिया को झकझोर देने वाली आँधी मौजूद थी।
5
किस मर्तबा थी हसरत-ए-दीदार मिरे साथ
जो फूल मिरी ख़ाक से निकला निगराँ था
मेरे साथ आपकी झलक की चाहत किस स्तर की थी, कि जो फूल मेरी राख से निकला वह निगरानी कर रहा था।
6
मजनूँ को अबस दावा-ए-वहशत है मुझी से
जिस दिन कि जुनूँ मुझ को हुआ था वो कहाँ था
मजनूँ से तुम अब किस तरह की वेश्यावृत्ति का दावा करती हो? जब मुझ पर जुनून शुरू हुआ था, तब वह कहाँ थी।
7
ग़ाफ़िल थे हम अहवाल-ए-दिल-ए-ख़स्ता से अपने
वो गंज उसी कुंज-ए-ख़राबी में निहाँ था
हम अपने टूटे हुए दिल की हालत से अनजान थे; वह खजाना उसी टूटी-फूटी जगह में छिपा था।
8
किस ज़ोर से फ़रहाद ने ख़ारा-शिकनी की
हर-चंद कि वो बेकस ओ बे-ताब-ओ-तवाँ था
फ़रहाद ने किस ज़ोर से ख़ारा-शिकनी की, कि हर-चंद वह बेकस, बे-ताब और बे-तवाँ हो गया था।
9
गो 'मीर' जहाँ में किन्हों ने तुझ को न जाना
मौजूद न था तू तो कहाँ नाम-ओ-निशाँ था
हे 'मीर', जहान में किन लोगों ने तुम्हें नहीं जाना? अगर तुम मौजूद न होते, तो तुम्हारा नाम और निशान कहाँ होता?
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