गो 'मीर' जहाँ में किन्हों ने तुझ को न जाना
मौजूद न था तू तो कहाँ नाम-ओ-निशाँ था
“O 'Meer,' in the world of Jahān, who did not know you? If you were not present, where would your name and sign have been?”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
हे 'मीर', जहान में किन लोगों ने तुम्हें नहीं जाना? अगर तुम मौजूद न होते, तो तुम्हारा नाम और निशान कहाँ होता?
विस्तार
यह शेर केवल अपनी तारीफ़ नहीं है, बल्कि शायर की अपनी अमरता का दावा है! मिर्ज़ा तक़ी मीर कह रहे हैं कि मेरी पहचान इतनी गहरी है कि अगर मैं आज मौजूद न होता... तो मेरा नाम, मेरी याद... कहीं नहीं होती। यह शेर साबित करता है कि एक शायर का प्रभाव वक़्त की सीमाओं से परे होता है।
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