ग़ज़ल

कैसा चमन असीरी में किस को इधर ख़याल

कैसा चमन असीरी में किस को इधर ख़याल

यह ग़ज़ल एक ऐसे मन की स्थिति का वर्णन करती है जो कैद या बंदी अवस्था में है, जहाँ मन को यह समझ नहीं आ रहा कि इस चमन (जीवन) का आकर्षण किस को और किस कारण से इतना अधिक लग रहा है। कवि कहते हैं कि टूटे हुए ख्वाबों और बिगड़ चुकी यादों के निशान मिटाना मुश्किल है, और जो चेहरे बिगड़ चुके हैं, उनके बारे में विचार न करना चाहिए। यह ग़ज़ल मन की जटिल भावनाओं, भ्रम और यादों के बोझ को दर्शाती है।

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
कैसा चमन असीरी में किस को इधर ख़याल पर्वाज़ ख़्वाब हो गई है बाल-ओ-पर ख़याल
यह कैसा बाग है, क़ैद में, किसके लिए यह ख़याल? यह तो बालों और पंखों का ख़्याल, एक उड़ान भरा सपना हो गया है।
2
मुश्किल है मिट गए हुए नक़्शों की फिर नुमूद जो सूरतें बिगड़ गईं उन का न कर ख़याल
मुश्किल है मिट गए हुए नक़्शों की फिर नुमूद, जो सूरतें बिगड़ गईं उन का न कर ख़याल।
3
मू को अबस है ताब कली यूँ ही तंग है उस का दहन है वहम-ओ-गुमान-ओ-कमर ख़याल
मू को अबस है ताब कली यूँ ही तंग है। उसका दहन है वहम-ओ-गुमान-ओ-कमर ख़याल।
4
रुख़्सार पर हमारे ढलकने को अश्क के देखे है जो कोई सो करे है गुहर ख़याल
हमारे गालों पर जो आँसू गिरते हैं, उन्हें केवल वे लोग देखते हैं जो गहराई से नहीं सोचते हैं।
5
किस को दिमाग़-ए-शेर-ओ-सुख़न ज़ोफ़ में कि 'मीर' अपना रहे है अब तो हमें बेशतर ख़याल
ऐ मीर, तू अपनी शायरी और बातों का दिमाग़ किसके पास रख रहा है? अब तो हमें और भी बहुत कुछ सोचना है।
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