मू को अबस है ताब कली यूँ ही तंग है — मीर तक़ी मीर

मू को अबस है ताब कली यूँ ही तंग है उस का दहन है वहम-ओ-गुमान-ओ-कमर ख़याल

“It is impossible to bind the budding rose like this, for it is consumed by delusion, illusion, and imagined thought.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

मू को अबस है ताब कली यूँ ही तंग है। उसका दहन है वहम-ओ-गुमान-ओ-कमर ख़याल।

विस्तार

Mir Taqi Mir हमें एक बहुत गहरा सच समझाते हैं। वो कहते हैं कि आशिक़ का दर्द, उसकी बेचैनी, किसी बाहरी वजह से नहीं है। यह जो आग जल रही है ना, यह किसी और की नहीं, बल्कि हमारे अपने 'वहम', हमारे 'गुमान' और हमारी कल्पनाओं की देन है। शायर कहते हैं कि हमें समझना होगा कि हमारा दुख, हमारे मन की उपज है।

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