ग़ज़ल
आए हैं 'मीर' मुँह को बनाए ख़फ़ा से आज
आए हैं 'मीर' मुँह को बनाए ख़फ़ा से आज
यह ग़ज़ल एक शायर के मन की बेचैनी और निराशा को व्यक्त करती है, जो बेवफ़ाई और जीवन के अनिश्चित मोड़ों पर विचार करता है। इसमें वह अपने दिल की कड़वी सच्चाई और निराशा के भाव को व्यक्त करता है, साथ ही जीवन की कठिनाइयों से मुक्ति पाने की इच्छा भी प्रकट करता है।
गीत सुनें
1
आए हैं 'मीर' मुँह को बनाए ख़फ़ा से आज
शायद बिगड़ गई है कुछ उस बेवफ़ा से आज
मीर आज ऐसे आए हैं कि उनका मुँह नाराज़ और ख़फ़ा लग रहा है; शायद आज किसी बेवफ़ा से उनका मनमुटाव हो गया है।
2
वाशुद हुई न दिल को फ़क़ीरों के भी मिले
खुलती नहीं गिरह ये कसू की दुआ से आज
वाशुद ने न दिल को फ़क़ीरों का भी झुकाया, और आज यह गाँठ कसू की दुआ से नहीं खुलती।
3
जीने में इख़्तियार नहीं वर्ना हम-नशीं
हम चाहते हैं मौत तो अपनी ख़ुदा से आज
यदि मुझे जीवन में अधिकार होता, तो हम-नशीं लोग अपनी ख़ुदा से आज मौत मांगते।
4
साक़ी टुक एक मौसम-ए-गुल की तरफ़ भी देख
टपका पड़े है रंग चमन में हवा से आज
शायर कह रहा है कि भले ही दृष्टि फूलों के मौसम की ओर हो, फिर भी आज हवा से रंग बगीचे में टपक रहा है।
5
था जी में उस से मिलिए तो क्या क्या न कहिए 'मीर'
पर कुछ कहा गया न ग़म-ए-दिल हया से आज
काश! मैं उससे मिलता तो क्या-क्या कहता 'मीर', पर आज ग़म-ए-दिल हया से कुछ कह न पाया।
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