था जी में उस से मिलिए तो क्या क्या न कहिए 'मीर' — मीर तक़ी मीर

था जी में उस से मिलिए तो क्या क्या न कहिए 'मीर' पर कुछ कहा गया न ग़म-ए-दिल हया से आज

“If I had met him, oh Mir, what would I have said? / But today, my heart's sorrow, was kept silent by shyness.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

काश! मैं उससे मिलता तो क्या-क्या कहता 'मीर', पर आज ग़म-ए-दिल हया से कुछ कह न पाया।

विस्तार

यह शेर उस दर्द को बयां करता है जब दिल में बहुत कुछ होता है, लेकिन लबों तक नहीं आ पाता। मीर तक़ी मीर कहते हैं कि अगर मैं आपसे मिलूँ, तो क्या-क्या बातें कहूँगा! पर आज... दिल का जो ग़म है न, उसे हया की वजह से कह नहीं पाया। यह उस खामोशी का इज़हार है, जो सबसे ज़्यादा दर्द देती है।

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