ग़ज़ल

दामान-ए-कोह में जो में डाढ़ मार रोया

दामान-ए-कोह में जो में डाढ़ मार रोया

यह ग़ज़ल जीवन के अनुभवों और टूटे वादों की पीड़ा को दर्शाती है, जहाँ वफ़ा और विश्वास पर भरोसा करना कठिन हो जाता है। कवि कहता है कि हर जगह रोने के लिए जगह थी, और उसने अपने मन का सारा ग़म एक बार में रो दिया।

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
दामान-ए-कोह में जो में डाढ़ मार रोया इक अब्र वाँ से उठ कर बे-इख़्तियार रोया
पहाड़ के किनारे जो विलाप कर रहा था, एक बादल से उठकर बेबस होकर रोया।
2
पड़ता न था भरोसा अहद-ए-वٖफ़ा-ए-गुल पर मुर्ग़-ए-चमन न समझा मैं तो हज़ार रोया
मेरा कभी भी विश्वास गुलाब की वफादारी के वादे पर नहीं हुआ; हे बाग के छोटे पक्षी, मैं तो हज़ार बार रोया।
3
हर गुल ज़मीन याँ की रोने ही की जगह थी मानिंद-ए-अब्र हर जा मैं ज़ार ज़ार रोया
हर फूल इस ज़मीन पर रोने की जगह था, और मैं बादल की तरह ज़ोर-ज़ोर से रोया।
4
थी मस्लहत कि रुक कर हिज्राँ में जान दीजे दिल खोल कर न ग़म में मैं एक बार रोया
यह बेहतर था कि मैं बिछोह में रुककर जान दे दूँ, और मैं कभी भी दुःख में मन खोलकर रोया नहीं।
5
इक इज्ज़ इश्क़ इस का अस्बाब-ए-सद-अलम था कल 'मीर' से बहुत मैं हो कर दो-चार रोया
इस प्रेम का कारण एक सौ प्रकार की कृपा थी; कल मीर से मैं थोड़े समय के लिए बहुत रोया।
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