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ग़ज़ल

कब तलक ये सितम उठाइएगा

कब तलक ये सितम उठाइएगा

कवि पूछते हैं कि ये सितम कब तक चलेगा, और कब वे अपने चेहरे पर बे-खुदी का भाव लाएँगे। वे कहते हैं कि सब से मिल-जुल कर जीवन जीना है, वरना कहीं ढूँढने पर भी न मिल पाएगा। यह जीवन की कैद और स्वतंत्रता की एक पुकार है।

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1
कब तलक ये सितम उठाइएगा एक दिन यूँही जी से जाइएगा
आप कब तक यह सितम सहेंगे? एक दिन आप यूँही मर जाएंगे।
2
शक्ल तस्वीर-ए-बे-ख़ुदी कब तक कसो दिन आप में भी आइएगा
शक्ल तस्वीर-ए-बे-ख़ुदी कब तक, कसो दिन आप में भी आइएगा। इसका शाब्दिक अर्थ है कि यह बे-ख़ुदी का मुखौटा कब तक रहेगा और आप भी कब अपना सच्चा रूप दिखाएंगे।
3
सब से मिल चल कि हादसे से फिर कहीं ढूँडा भी तो न पाइएगा
हर किसी से या किसी हादसे से, फिर कहीं भी ढूँढा तो नहीं मिलेगा।
4
न मूए हम असीरी में तो नसीम कोई दिन और बाव खाइएगा
यदि हम कैद में मरते नहीं हैं, हे नसीम, तो किसी दिन तुम भी ज़रूर मरोगे।
5
कहियेगा उस से क़िस्सा-ए-मजनूँ या'नी पर्दे में ग़म सुनाइएगा
उससे मजनू की कहानी कहिए, यानी पर्दे के पीछे का दुःख सुनाइए।
6
उस के पा-बोस की तवक़्क़ो' पर अपने तीं ख़ाक में मिलाइएगा
उस के पा-बोस की तवक़्क़ो' पर, अपने तीं ख़ाक में मिलाइएगा। (अर्थ: उसके पाँव के पीछे के हिस्से की नसों/त्वचा पर, अपनी तीव्र साँस/खुशबू मिला देना।)
7
उस के पाँव को जा लगी है हिना ख़ूब से हाथ उसे लगाइएगा
उसके पैर पर मेहंदी लगी है, उसके हाथों को अच्छे से सजा देना।
8
शिरकत-शैख़-ओ--बरहमन से 'मीर' का'बा-ओ-दैर से भी जाइएगा
शिरकत-शैख़-ओ-बरहमन से, का'बा-ओ-दैर से भी जाइएगा।
9
अपनी डेढ़ ईंट की जद्दी मस्जिद किसी वीराने में बनाइयेगा
अपनी डेढ़ ईंट की जद्दी मस्जिद किसी वीराने में बनाइयेगा।
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