ग़ज़ल
दिल-ओ-दिमाग़ है अब किस को ज़िंदगानी का
दिल-ओ-दिमाग़ है अब किस को ज़िंदगानी का
यह ग़ज़ल जीवन के उद्देश्य और जवानी के खोए हुए एहसास पर एक गहन चिंतन प्रस्तुत करती है। शायर पूछते हैं कि अब दिल और दिमाग़ किस चीज़ को ज़िंदगानी का आधार मानते हैं, और कैसे समय के साथ जवानी का अफ़सोस एक गहरा विषय बन जाता है। यह ग़ज़ल जीवन के बदलते स्वरूप और समय के क्रूर हाथों द्वारा छीन लिए गए सपनों पर एक मार्मिक टिप्पणी है।
गीत सुनें
1
दिल-ओ-दिमाग़ है अब किस को ज़िंदगानी का
जो कोई दम है तो अफ़्सोस है जवानी का
दिल और दिमाग़ अब किस को ज़िंदगी का सवाल है। जो कोई साँस लेता है, उसे जवानी के गुज़र जाने का अफ़सोस है।
2
अगरचे उम्र के दस दिन ये लब रहे ख़ामोश
सुख़न रहेगा सदा मेरी कम-ज़बानी का
अगर मेरे होंठ उम्र के दस दिन तक शांत रहें, फिर भी मेरा वचस् हमेशा मेरी सादगी का प्रमाण रहेगा।
3
सुबुक है आवे जो मिंदील रख नमाज़ को शैख़
रहा है कौन सा अब वक़्त सरगिरानी का
जो व्यक्ति नमाज़ के लिए मुंडेर (पगड़ी) लेकर आता है, वह शेख कहता है, 'अब भटकाव और उलझन का समय किसका है?'
4
हज़ार जान से क़ुर्बान बे-परी के हैं
ख़याल भी कभू गुज़रा न पर-फ़िशानी का
हज़ार जान से क़ुर्बान बे-परी के हैं; ख़याल भी कभू गुज़रा न पर-फ़िशानी का। इसका अर्थ है कि प्रियतमा के लिए हज़ार जान कुर्बान हैं, और कभी भी उस प्रेम को भुलाने का विचार मन में नहीं आया।
5
फिरे है खींचे ही तलवार मुझ पे हर-दम तो
कि सैद हूँ मैं तिरी दुश्मनी जानी का
तुम हर समय मुझ पर तलवार खींचते रहते हो, जबकि मैं इतना निर्दोष हूँ कि मुझे तुम्हारी दुश्मनी का पता ही नहीं है।
6
नुमूद कर के वहीं बहर-ए-ग़म में बैठ गया
कहे तो 'मीर' भी इक बुलबुला था पानी का
नमूद कर के वहीं बहर-ए-ग़म में बैठ गया, कहे तो 'मीर' भी इक बुलबुला था पानी का।
(अर्थ: अपना सब कुछ उंडेलकर वह ग़म के सागर में बैठ गया और कहने लगा कि 'मीर' भी तो बस पानी का एक बुलबुला था।)
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