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ग़ज़ल

ख़ूब थे वे दिन कि हम तेरे गिरफ़्तारों में थे

ख़ूब थे वे दिन कि हम तेरे गिरफ़्तारों में थे

ये ग़ज़ल उन दिनों को याद करती है जब हम तुम्हारे साथ थे, जब हम गम और दुख से भरे थे। यह बताती है कि अब हम अजनबियों के लिए भी दुश्मनी जान चुके हैं, और पहले की तरह दोस्तों के साथ भी एक माहौल बन गया था। यह उन लोगों के बारे में भी है जो बीमारों के बीच भी आँख उठाकर देख नहीं पाए।

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1
ख़ूब थे वे दिन कि हम तेरे गिरफ़्तारों में थे ग़म-ज़दों अंदोह-गीनों ज़ुल्म के मारों में थे
वे दिन बहुत अच्छे थे जब हम तुम्हारे बंधक थे, जब हम दुःख से भरे, उदास और अत्याचार के शिकार लोगों के बीच थे।
2
दुश्मनी जानी है अब तो हम से ग़ैरों के लिए इक समाँ सा हो गया वो भी कि हम यारों में थे
अब तो हमारी दुश्मनी गैर-लोगों को पता है, लेकिन हमारे दोस्तों के लिए एक अलग ही माहौल बन गया है।
3
मत तबख़्तुर से गुज़र क़ुमरी हमारी ख़ाक पर हम भी इक सर्व-ए-रवाँ के नाज़-बरदारों में थे
ऐ चाँद, हमारी धूल पर मत गुज़र, जो तख़्तूर से होकर गुज़रती है। हम भी एक बहती हुई धारा की शोभा-समृद्धि के नज़ारों में थे।
4
मर गए लेकिन न देखा तू ने ऊधर आँख उठा आह क्या क्या लोग ज़ालिम तेरे बीमारों में थे
मर गए, मगर तूने वहाँ मेरी आँख तक नहीं उठाई; आह, क्या ज़ालिम लोग थे, जो तेरे बीमारों में थे।
5
शैख़-जी मिंदील कुछ बिगड़ी सी है क्या आप भी रिंदों बाँकों मय-कशों आशुफ़्ता दस्तारों में थे
शेख़-जी, मिंदील कुछ बिगड़ी सी है क्या आप भी रिंदों, बाँकों, मय-कशों, आशुफ़्ता दस्तारों में थे?
6
गरचे जुर्म-ए-इश्क़ ग़ैरों पर भी साबित था वले क़त्ल करना था हमें हम ही गुनहगारों में थे
अर्थ यह है कि भले ही इश्क़ का गुनाह अजनबियों पर भी साबित हुआ हो, हे वली, लेकिन हमें क़त्ल करना हम खुद गुनाहगार थे।
7
इक रहा मिज़्गाँ की सफ़ में एक के टुकड़े हुए दिल जिगर जो 'मीर' दोनों अपने ग़म-ख़्वारों में थे
मिज़्गाँ की कतार में एक के टुकड़े हुए, दिल और जिगर, जो 'मीर' दोनों अपने ग़म-ख़्वारों में थे।
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