ग़ज़ल
मुझ सोज़ बा'द-ए-मर्ग से आगाह कौन है
मुझ सोज़ बा'द-ए-मर्ग से आगाह कौन है
यह ग़ज़ल जीवन और मृत्यु के रहस्यमय संबंध पर चिंतन करती है, जिसमें कवि पूछता है कि मरने के बाद के अनुभवों से कौन आगाह है। इसमें एक यात्री की बेचैनी, सच्चे मार्गदर्शक और ईश्वर की सर्वव्यापकता पर सवाल उठाए गए हैं।
गीत सुनें
1
मुझ सोज़ बा'द-ए-मर्ग से आगाह कौन है
शम-ए-मज़ार मीर ब-जुज़ आह कौन है
मृत्यु के बाद के दुःख से कौन आगाह है? ऐ कब्र की लौ, आह से कौन आगाह है?
2
बेकस हूँ मुज़्तरिब हूँ मुसाफ़िर हूँ बे-वतन
दूरी-ए-राह बन मिरे हमराह कौन है
मैं असहाय हूँ, बेचैन हूँ, मैं एक बेघर मुसाफ़िर हूँ; इस दूरी के रास्ते पर मेरा हमराह कौन है।
3
लबरेज़ जिस के हुस्न से मस्जिद है और दैर
ऐसा बुतों के बीच वो अल्लाह कौन है
लबरेज़ जिसके हुस्न से मस्जिद है और दैर, ऐसा बुतों के बीच वो अल्लाह कौन है। (अर्थात्, जिस व्यक्ति की सुंदरता इतनी ज़्यादा है कि उससे मस्जिद और मठ दोनों बनाए गए हैं, ऐसे व्यक्ति के सामने ईश्वर का कोई अस्तित्व नहीं है।)
4
रखियो क़दम सँभल के कि तू जानता नहीं
मानिंद-ए-नक़्श-ए-पा ये सर-ए-राह कौन है
सावधानी से कदम रखना, क्योंकि तुम्हें नहीं पता कि इस रास्ते के सिरे पर कौन है जो इस निशान-ए-पा (पैर के निशान) जैसा है।
5
ऐसा असीर ख़स्ता-जिगर मैं सुना नहीं
हर आह 'मीर' जिस की है जाँ-काह कौन है
शायर कहता है कि उसने ऐसा कोई बीमार और कमजोर दिल नहीं सुना, जिसके दर्द की गहराई को कोई समझ सके।
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