ग़ज़ल

क़रार दिल का ये काहे को ढंग था आगे

क़रार दिल का ये काहे को ढंग था आगे

यह ग़ज़ल बताती है कि दिल का ये कैसा ठिकाना है, क्योंकि यहाँ के सारे रिश्ते और वक़्त का कोई ढंग नहीं रहा। हम लोगों ने अपने चेहरे पर भी रंग चढ़ा रखा था, लेकिन अब यहाँ के हर ज़ख्म और हर आह का कोई ठिकाना नहीं रहा।

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
क़रार दिल का ये काहे को ढंग था आगे हमारे चेहरे के ऊपर भी रंग था आगे
दिल की शांति का यह ढंग आगे किस काम का था? हमारे चेहरे पर भी तो रंग था आगे।
2
उठाएँ तेरे लिए बद-ज़बानियाँ उन की जिन्हों की हम को ख़ुशामद से नंग था आगे
तेरे लिए हम उन लोगों की निंदा (बद-ज़बानियाँ) उठाएँगे, जिन्हें हमारी चापलूसी से कोई ज़रूरत नहीं थी।
3
हमारी आहों से सीने पे हो गया बाज़ार हर एक ज़ख़्म का कूचा जो तंग था आगे
हमारी आहों से सीने पर बाज़ार हो गया, और हर ज़ख़्म का रास्ता जो पहले तंग था, वह अब आगे खुल गया।
4
रहा था शम्अ' से मज्लिस में दोष कितना फ़र्क़ कि जल बुझे थे ये हम पर पतंग था आगे
रहमअ' की रोशनी से महफ़िल में दोष कितना फ़र्क़ था, कि जैसे कोई पतंग जलकर बुझ गई हो और हमारे सामने लटकी हुई हो।
5
किया ख़राब तग़ाफ़ुल ने उस के वर्ना 'मीर' हर एक बात पे दुश्नाम-ओ-संग था आगे
अगर प्रिय के लापरवाही न होती, तो हर बात दुश्मनी और दोस्ती का कारण होती।
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