रहा था शम्अ' से मज्लिस में दोष कितना फ़र्क़ — मीर तक़ी मीर
“How much difference was the fault in the gathering, from the dim lamp's glow? It was like a kite that had burned out, hanging before us.”
अर्थ
रहमअ' की रोशनी से महफ़िल में दोष कितना फ़र्क़ था, कि जैसे कोई पतंग जलकर बुझ गई हो और हमारे सामने लटकी हुई हो।
विस्तार
यह शेर मिर्ज़ा तक़ी मीर साहब के गहरे तफ़कर को दर्शाता है। शायर यहां पूछ रहे हैं कि महफ़िल में जो दोष या कमी दिखाई देती है, और असलियत में जो है, उसमें कितना फ़र्क़ होता है। शमा और पतंग का ज़िक्र हमें सिखाता है कि अक्सर हमारे नज़रों में जो 'दोष' होता है, वह महज़ एक भ्रम होता है। यह शेर हमें सिखाता है कि हमें किसी चीज़ को जज करने से पहले, उसकी पूरी कहानी जाननी चाहिए।
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