ग़ज़ल

मुश्किल है होना रू-कश रुख़्सार की झलक के

मुश्किल है होना रू-कश रुख़्सार की झलक के

यह ग़ज़ल एक नशीली और मोहक सौंदर्य की झलक पाने की कठिनाई पर केंद्रित है। शायर कहते हैं कि वह मनुष्य मात्र है, जो किसी दिव्य या शाही व्यक्तित्व के सामने अपनी नश्वरता महसूस करता है। जीवन के रिश्ते और दुनियावी बंधन भी केवल दिखावे मात्र हैं, और शायर अपने आँसुओं पर भरोसा करते हुए इस दुनिया की वास्तविकता को स्वीकार करते हैं।

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
मुश्किल है होना रू-कश रुख़्सार की झलक के हम तो बशर हैं उस जा पर जुलते हैं मलक के
किसी प्रिय की सुंदर झलक देखना कठिन है, क्योंकि हम तो साधारण मनुष्य हैं जो किसी दिव्य सत्ता के आकर्षण में जलते हैं।
2
मरता है क्यूँ तो नाहक़ यारी बिरादरी पर दुनिया के सारे नाते हैं जीते-जी तिलक के
मरता है क्यूँ तो नाहक़ यारी बिरादरी पर। दुनिया के सारे नाते हैं जीते-जी तिलक के।
3
कहते हैं गोर में भी हैं तीन रोज़ भारी जावें किधर इलाही मारे हुए फ़लक के
कहा जाता है कि जंगल में भी तीन दिन बहुत मुश्किल होते हैं, हम कहाँ जाएँ, ऐ खुदा, उस आसमान से जहाँ मौत का राज है।
4
लाते नहीं नज़र में गुलतानी गुहर को हम मो'तक़िद हैं अपने आँसू ही की ढलक के
लाते नहीं नज़र में गुलतानी गुहर को, हम तो मुक़द्दिद हैं अपने आँसू ही की ढलक के। (अर्थात, जिस तरह एक सुंदर फूल अपनी नज़र नहीं झुकाता, उसी तरह मैं अपने आँसुओं को बहने देता हूँ।)
5
कल इक मिज़ा निचोड़े तूफ़ान नूह आया फ़िक्र-ए-फ़िशार में हूँ 'मीर' आज हर पलक के
कल इक मिज़ा निचोड़े तूफ़ान नूह आया, फ़िक्र-ए-फ़िशार में हूँ 'मीर' आज हर पलक के। इसका अर्थ है कि कल एक मिज़ाज (मनोदशा) से नूह का तूफ़ान आ गया है, और 'मीर' आज हर पलक की फ़िक्र-ए-फ़िशार (दबाव/चिंता) में है।
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