ग़ज़ल
दुज़्दीदा निगह करना फिर आँख मिलाना भी
दुज़्दीदा निगह करना फिर आँख मिलाना भी
यह ग़ज़ल एक जटिल और विरोधाभासी प्रेम स्थिति का वर्णन करती है, जहाँ प्रेमी से अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी निराशा और विमुखता (दुज़्दीदा निगह) के बाद भी प्रेमी की आँखों में झाँक सके और इस लौटते हुए प्रेम के दामन को उठा सके। यह प्रेम की मनमानी, दिखावे और भावनात्मक उलझन को दर्शाती है, जहाँ सादे दिखावे के साथ-साथ भावनात्मक सतावा और पर्दे के पीछे का प्रदर्शन भी ज़रूरी है।
गीत सुनें
1
दुज़्दीदा निगह करना फिर आँख मिलाना भी
इस लौटते दामन को पास आ के उठाना भी
दुज़्दीदा नज़रों से देखना और फिर उनसे आँखें मिलाना भी, और इस लौटते दामन को पास आकर उठा लेना भी।
2
पामाली-ए-आशिक़ को मंज़ूर रखे जाना
फिर चाल कढब चलना ठोकर न लगाना भी
आशिक़ की मनमानी को स्वीकार्य बनाए रखना है, तो चाल-चलन में भी सावधानी बरतनी होगी, कहीं ठोकर न खा लें।
3
बुर्क़ा को उठा देना पर आधे ही चेहरे से
क्या मुँह को छुपाना भी कुछ झमकी दिखाना भी
बुर्का हटाने पर भी, आधे चेहरे से क्या छुपाना या क्या चमक दिखाना बाकी है।
4
देख आँखें मिरी नीची इक मारना पत्थर भी
ज़ाहिर में सताना भी पर्दे में जताना भी
देख, मेरी आँखें झुकी हैं, चाहे पत्थर से मारा जाए, या खुलेआम सताया जाए, या परदे के पीछे दिखाया जाए।
5
सोहबत है ये वैसी ही ऐ जान की आसाइश
साथ आन के सोना भी फिर मुँह को छुपाना भी
यह साथ वैसी ही है, ऐ जान की आशिष। साथ आने से सोना भी और मुँह को छुपाना भी।
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