ग़ज़ल

मैं ने जो बे-कसाना मज्लिस में जान खोई

मैं ने जो बे-कसाना मज्लिस में जान खोई

यह ग़ज़ल एक ऐसी महफ़िल का वर्णन करती है जहाँ शायर ने अपनी जान गँवा दी। इसमें महफ़िल की चकाचौंध और रहस्यमय माहौल में प्रेम की तीव्र भावनाओं और तड़प को व्यक्त किया गया है। शायर बताता है कि कैसे किसी के एक इशारे ने उसके वजूद को डुबो दिया।

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
मैं ने जो बे-कसाना मज्लिस में जान खोई सर पर मिरे खड़ी हो शब शम्अ' ज़ोर रवी
मैंने जो नंगे पाँव महफ़िल में जान गंवाई, वह मेरे सिर पर जलती शमा है, जिसे सूरज की तेज़ रोशनी से जलाया गया है।
2
आती है शम्अ' शब को आगे तिरे ये कह कर मुँह की गई जो लोई तो क्या करेगा कोई
जैसे दीपक रात को आगे बढ़ने को कहता है, वैसे ही अगर मैं अपना मुँह चोट पहुँचा लूँ, तो कोई क्या करेगा।
3
बे-ताक़ती से आगे कुछ पूछता भी था सो रोने ने हर घड़ी के वो बात ही डुबोई
बे-ताक़ती से आगे कुछ पूछने की हिम्मत रखता था, पर आँसुओं ने हर पल वो बात ही डुबो दी।
4
बुलबुल की बेकली ने शब बे-दिमाग़ रखा सोने दिया न हम को ज़ालिम न आप सोई
बुलबुल की चहक-चहक ने रात को बेताब रखा, और न आप, ज़ालिम, सो पाए।
5
उस ज़ुल्म पेशा की ये रस्म-ए-क़दीम है गी ग़ैरों पे मेहरबानी यारों से कीना-जूई
शायर कहता है कि आपके इस क्रूर पेशे की यह पुरानी रस्म है, कि परदेसियों पर मेहरबानी करना और दोस्तों को भी बेचना।
6
नौबत जो हम से गाहे आती है गुफ़्तुगू की मुँह में ज़बाँ नहीं है इस बद-ज़बाँ के गोई
जब तुमसे बात करने का मौका मिलता है, तो उसकी आवाज़ ऐसी होती है कि इस बुरे ज़बान के पास कोई और बात कहने का ढंग नहीं बचता।
7
उस मह के जल्वे से कुछ ता 'मीर' याद देवे अब के घरों में हम ने सब चाँदनी है बोई
उस मह के जादू से कुछ ता 'मीर' की याद आ गई, और अब हमने सबके घरों में चाँदनी बिछा दी है।
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