ग़ज़ल
एक पर्वाज़ को भी रुख़्सत-ए-सय्याद नहीं
एक पर्वाज़ को भी रुख़्सत-ए-सय्याद नहीं
यह ग़ज़ल कवि की गहरी कैद और शक्तिहीनता को दर्शाती है। आज़ादी के एक भी प्रयास को शिकारी द्वारा अनुमति नहीं दी जाती, जो एक अपरिहार्य बंधन का संकेत है। उत्पीड़क से न्याय चाहने के बावजूद, उसकी अत्यधिक कमज़ोरी उसे शिकायत करने तक की शक्ति से वंचित कर देती है।
गीत सुनें
1
एक पर्वाज़ को भी रुख़्सत-ए-सय्याद नहीं
वर्ना ये कुंज-ए-क़फ़स बैज़ा-ए-फ़ौलाद नहीं
एक शायर के जाने का रुख़्सत-ए-सय्याद (आरामदायक विदाई) भी संभव नहीं है, क्योंकि यह कुंज-ए-क़फ़स (पिंजरे का कोना) सोने से सजा नहीं है।
2
शैख़-ए-उज़्लत तो तह-ए-ख़ाक भी पहुँचेगी बहम
मुफ़्त है सैर कि ये आलम-ए-ईजाद नहीं
शैख़-ए-उज़्लत तो तह-ए-ख़ाक भी पहुँचेगी बहम। मुफ़्त है सैर कि ये आलम-ए-ईजाद नहीं। (अर्थ: जो अकेलापन का माहिर है, वह तो धूल के नीचे भी पहुँच जाएगा। यह सैर करना मुफ्त है, यह दुनिया की रचना नहीं है।)
3
दाद ले छोड़ूँ मैं सय्याद से अपनी लेकिन
ज़ोफ़ से मेरे तईं ताक़त-ए-फ़रयाद नहीं
हालांकि मैं अपनी प्रियतमा को सैयाद के पास छोड़ रही हूँ, लेकिन ज़ौफ़ से मुझे विलाप की कोई शक्ति नहीं है।
4
क्यूँ ही मा'ज़ूर भी रख यूँ तो समझ दिल में शैख़
ये क़दह-ख़्वार मिरे क़ाबिल-ए-इरशाद नहीं
ऐ शेख़, तुम अपने दिल में बहाना क्यों रखते हो? समझ लो कि यह शराब पीने वाला व्यक्ति तुम्हारे मार्गदर्शन के योग्य नहीं है।
5
बे-सुतूँ भी है वही और वही जू-ए-शीर
था नमक शोहरत-ए-शीरीं का सो फ़रहाद नहीं
वह (व्यक्ति) अपनी सादी अवस्था में भी वैसा ही है, और वैसा ही दूधिया शेर के साथ; परंतु शोहरत की मिठास का नमक (स्वाद) फ़रहाद के लिए नहीं था।
6
क्या कहूँ 'मीर' फ़रामोश किया उन ने तुझे
मैं तो तक़रीब भी की पर तू उसे याद नहीं
क्या कहूँ 'मीर', उन्होंने तुझे फ़रामोश किया; मैंने तो तक़रीब भी की, पर तू उसे याद नहीं।
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