एक पर्वाज़ को भी रुख़्सत-ए-सय्याद नहीं — मीर तक़ी मीर
“Even a departure like a poet's departure is not possible For this grove-cage is not adorned with gold.”
अर्थ
एक शायर के जाने का रुख़्सत-ए-सय्याद (आरामदायक विदाई) भी संभव नहीं है, क्योंकि यह कुंज-ए-क़फ़स (पिंजरे का कोना) सोने से सजा नहीं है।
विस्तार
यह शेर पूरी तरह से बेबसी और क़ैद होने के एहसास को बयां करता है। मिर्ज़ा तक़ी मीर कहते हैं कि यहाँ की तक़दीर इतनी सख़्त है कि पंछी को उड़ने की आज़ादी भी नहीं है। ये क़फ़स किसी साधारण पिंजरे जैसा नहीं है, बल्कि यह चाँदी की परत चढ़ा हुआ, मज़बूत फ़ौलाद का बना हुआ है। यह एहसास किसी गहरी भावनात्मक कैद का होता है।
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