शैख़-ए-उज़्लत तो तह-ए-ख़ाक भी पहुँचेगी बहम — मीर तक़ी मीर

शैख़-ए-उज़्लत तो तह-ए-ख़ाक भी पहुँचेगी बहम मुफ़्त है सैर कि ये आलम-ए-ईजाद नहीं

“The master of solitude will reach even beneath the dust, For wandering is free, this is not the world of creation.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

शैख़-ए-उज़्लत तो तह-ए-ख़ाक भी पहुँचेगी बहम। मुफ़्त है सैर कि ये आलम-ए-ईजाद नहीं। (अर्थ: जो अकेलापन का माहिर है, वह तो धूल के नीचे भी पहुँच जाएगा। यह सैर करना मुफ्त है, यह दुनिया की रचना नहीं है।)

विस्तार

यह शेर जीवन की नश्वरता और आज़ादी के भ्रम पर एक गहरा विचार है। शायर कहते हैं कि 'तन्हाई' या 'एकांत' का एहसास भी अंत में धूल में मिल जाएगा। भटकना मुफ़्त है, लेकिन यह जो दुनिया है, यह 'आलम-ए-ईजाद' हमें कभी भी नहीं छोड़ती। यह हमें सिखाता है कि जीवन की वास्तविकता कितनी अस्थिर और जटिल है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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