ग़ज़ल
अब आँखों में ख़ूँ दम-ब-दम देखते हैं
अब आँखों में ख़ूँ दम-ब-दम देखते हैं
यह ग़ज़ल एक गहरे प्रेम और विरह की भावना को व्यक्त करती है, जहाँ शायर अपने प्रिय के प्रति अपनी भावनाओं को आंखों में रक्त की तरह उबलते हुए दिखाता है। वह बताता है कि उसके दिल में गहरा दर्द और विरह की पीड़ा है, जिसके कारण वह अपने प्रिय के कदमों को देखने के लिए व्याकुल है। यह ग़ज़ल प्रेम के उस चरम बिंदु का वर्णन करती है जहाँ जीवन और मृत्यु का भेद मिट जाता है।
गीत सुनें
1
अब आँखों में ख़ूँ दम-ब-दम देखते हैं
न पूछो जो कुछ रंग हम देखते हैं
अब हमारी आँखों में हर पल खून की तरह लालिमा है; आप यह न पूछें कि हम कौन-कौन से रंग देखते हैं।
2
जो बे-अख़्तियारी यही है तो क़ासिद
हमीं आ के उस के क़दम देखते हैं
जो बे-अख़्तियारी की स्थिति है, तो आशिक़ (प्रेमी) का क़ासिद (प्रेमी) ही उसके क़दमों को देखने आता है।
3
गहे दाग़ रहता है दिल गा जिगर ख़ूँ
उन आँखों से क्या क्या सितम देखते हैं
दिल में एक दाग़ रहता है, ओ दिल, ओ जिगर, ओ खून। उन आँखों से क्या-क्या सितम देखे हैं।
4
अगर जान आँखों में उस बिन है तो हम
अभी और भी कोई दम देखते हैं
अगर जान आँखों में किसी और की है, तो हम अभी और भी कोई नज़ारा देखते हैं।
5
लिखें हाल क्या उस को हैरत से हम तो
गहे काग़ज़ ओ गह क़लम देखते हैं
उसको क्या हाल लिखेंगे, हम तो हैरत से बस कागज़ और कलम को देखते हैं।
6
वफ़ा-पेशगी क़ैस तक थी भी कुछ कुछ
अब उस तौर के लोग कम देखते हैं
शायर कह रहे हैं कि वफ़ादारी और निष्ठा पहले बहुत दिखाई देती थी, लेकिन अब ऐसे लोग कम मिलते हैं।
7
कहाँ तक भला रोओगे 'मीर'-साहिब
अब आँखों के गिर्द इक वरम देखते हैं
शायर मीर से कहा जा रहा है कि वह अब और रोएगा नहीं, क्योंकि उसकी आँखों में एक प्रियजन का दर्शन हो रहा है।
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