ग़ज़ल
निकले है चश्मा जो कोई जोश-ए-ज़नाँ पानी का
निकले है चश्मा जो कोई जोश-ए-ज़नाँ पानी का
यह ग़ज़ल एक तरह से एक भावनात्मक या काव्यात्मक अवलोकन प्रस्तुत करती है, जिसमें 'चश्मा' (चश्मा) का उपयोग किसी नज़ारे या अनुभव की विशिष्टता को दर्शाने के लिए किया गया है। यह जीवन के विविध और कभी-कभी जटिल पहलुओं पर विचार करती है, जिसमें सौंदर्य, आस्था और मानवीय भावनाओं का मिश्रण है।
गीत सुनें
1
निकले है चश्मा जो कोई जोश-ए-ज़नाँ पानी का
याद-दह है वो कसो चश्म की गिर्यानी का
जब भी कोई जोश के साथ बाहर निकलता है, तो किसी की निगाहों में चश्मे की याद आ जाती है, लेकिन वह चश्मे के टूटने का दुःख किसे याद दिलाता है।
2
लुत्फ़ अगर ये है बुताँ संदल पेशानी का
हुस्न क्या सुब्ह के फिर चेहरा-ए-नूरानी का
अगर यह सुगंधित चंदन की महक ही कृपा है, तो सुबह के नूरानी चेहरे की सुंदरता क्या होगी।
3
कुफ़्र कुछ चाहिए इस्लाम की रौनक़ के लिए
हुस्न ज़ुन्नार है तस्बीह-ए-सुलैमानी का
कुफ़्र (नास्तिकता) इस्लाम की रौनक के लिए कुछ चाहिए, और यह सुलैमान के तस्बीह (माला) का हुस्न (सौंदर्य) है।
4
दरहमी हाल की है सारे मिरे दीवाँ में
सैर कर तू भी ये मजमूआ' परेशानी का
मेरे पूरे दीवान में मेरे दिल की हालत है; तुम भी इस परेशानी के संग्रह में घूमकर देखो।
5
जान घबराती है अंदोह से तन में क्या क्या
तंग अहवाल है उस यूसुफ़-ए-ज़िंदानी का
जान घबराती है अंदोह से, शरीर में क्या-क्या तंग है, उस यूसुफ़-ए-ज़िंदानी का।
6
खेल लड़कों का समझते थे मोहब्बत के तईं
है बड़ा हैफ़ हमें अपनी भी नादानी का
शायर कहते हैं कि वह लड़कों के खेल को मोहब्बत के सच्चे अर्थ समझना समझते थे, लेकिन अब उन्हें अपनी नादानी बहुत बड़ी लगती है।
7
वो भी जाने कि लहू रो के लिखा है मक्तूब
हम ने सर नामा किया काग़ज़ अफ़्शानी का
वो भी जाने कि यह मक्तूब लहू के आँसुओं से लिखा गया है, और हमने कहानियों के कागज़ पर अपना नाम लिख दिया है।
8
उस का मुँह देख रहा हूँ सो वही देखूँ हूँ
नक़्श का सा है समाँ मेरी भी हैरानी का
जिसका मुख मैं देख रहा हूँ, वही मैं देख रहा हूँ। मेरे भी आश्चर्य का माहौल किसी नक़्श जैसा है।
9
बुत-परस्ती को तो इस्लाम नहीं कहते हैं
मो'तक़िद कौन है 'मीर' ऐसी मुसलमानी का
कवि कहते हैं कि मूर्तिपूजा को इस्लाम नहीं कहते हैं, तो इस तरह के मुसलमान का मानने वाला कौन है, ऐ मीर।
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