ग़ज़ल
मौसम-ए-गुल आया है यारो कुछ मेरी तदबीर करो
मौसम-ए-गुल आया है यारो कुछ मेरी तदबीर करो
यह ग़ज़ल अपने प्रियतम के आगमन और प्रेम के मौसम का वर्णन करती है, जिसमें शायर से अपने प्रेम की स्थिति को संभालने और उसे सजा देने की गुहार लगाई गई है। वह कहता है कि वह प्रेम के माहौल में कैद होना चाहता है, और उसे अपनी स्थिति पर कोई तकरार या बात करने की ज़रूरत नहीं है। शायर यह भी कहता है कि लोगों के दिलों पर मालिक ने जो कृपा की है, उसमें से भी वह कुछ चाहता है, और चाहता है कि उसका दुख और विलाप भी लोगों के दिलों को छू ले।
गीत सुनें
1
मौसम-ए-गुल आया है यारो कुछ मेरी तदबीर करो
यानी साया-ए-सर्व-ओ-गुल में अब मुझ को ज़ंजीर करो
यारों, क्या गुलाब का मौसम आ गया है? मेरे लिए कोई व्यवस्था करो। या यूँ कहूँ कि, सभी फूलों की छाँव में अब मुझे जकड़ लो।
2
पेश-ए-सआयत क्या जाए है हक़ है मेरी तरफ़ सो है
मैं तो चुप बैठा हूँ यकसू गर कोई तक़रीर करो
पेश-ए-सआयत का क्या जाए, है हक़ मेरी तरफ़ सो है। मैं तो चुप बैठा हूँ, यकसू गर कोई तक़रीर करो।
3
कान लगा रहता है ग़ैर उस शोख़ कमाँ अबरू के बहुत
इस तो गुनाह-ए-अज़ीम पे यारो नाक में उस की तीर करो
शायर कहता है कि किसी अजनबी के खूबसूरत और नटखट धनुष पर बहुत ध्यान जाता है, लेकिन इस बड़े गुनाह के लिए दोस्तों, उसके नथुने में तीर मार दो।
4
फेर दिए हैं दिल लोगों के मालिक ने कुछ मेरी तरफ़
तुम भी टुक ऐ आह-ओ-नाला क़ल्बों में तासीर करो
लोगों के मालिक ने मेरे दिल का रुख़ बदल दिया है; तुम भी आहों और नलायतों का जादू मेरे दिल पर करो।
5
आगे ही आज़ुर्दा हैं हम दिल हैं शिकस्ता हमारे सब
हर्फ़-ए-रंजिश बीच में ला कर और न अब दिल-गीर करो
हम पहले से ही दुखी हैं, और हमारे सभी दिल टूटे हुए हैं। अब शिकायत या नाराज़गी की बातें बीच में लाकर हमें और उदास न करो।
6
शेर किए मौज़ूँ तो ऐसे जिन से ख़ुश हैं साहिब-ए-दिल
रोवें कुढ़ें जो याद करें अब ऐसा तुम कुछ 'मीर' करो
अगर आप ऐसे शेर करें जिनसे साहिब-ए-दिल खुश हों, या ऐसे शेर करें कि हमें याद करके रोना और कड़वाहट महसूस हो, तो मिर्, कुछ ऐसा करें।
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