ग़ज़ल
आम हुक्म-ए-शराब करता हूँ
आम हुक्म-ए-शराब करता हूँ
यह ग़ज़ल शराब के नशा और जीवन के अनियंत्रित भोग को दर्शाती है। कवि कहता है कि वह आम हुक्म से नशा और भोग करता है, जैसे मोहतसिब को कबाब करना या बिना-हस्ती का टुकड़ा रहना। यह वियोग, बहस और अथाह प्यास के माध्यम से जीवन के हर पहलू को भोगने का एक अतिरंजित चित्रण है।
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1
आम हुक्म-ए-शराब करता हूँ
मोहतसिब को कबाब करता हूँ
मैं शराब को आम करने का हुक्म देता हूँ और उस मोहतसिब यानी नैतिकता के रखवाले को कबाब की तरह भून देता हूँ।
2
टुक तो रह ऐ बिना-ए-हस्ती तू
तुझ को कैसा ख़राब करता हूँ
ऐ वजूद की बुनियाद, ज़रा ठहर तो सही, देख मैं तुझे किस तरह बर्बाद और ख़राब करता हूँ।
3
बहस करता हूँ हो के अबजद-ख़्वाँ
किस क़दर बे-हिसाब करता हूँ
वर्णमाला सीखने वाले एक शुरुआती छात्र की तरह होने के बावजूद, मैं बहस करता हूँ। मैं कितनी बेहिसाब और अत्यधिक बहस करता हूँ।
4
कोई बुझती है ये भड़क में अबस
तिश्नगी पर इ'ताब करता हूँ
इस भड़कती आग में यह प्यास बेकार ही बढ़ रही है और यह बुझती नहीं। मैं अपनी प्यास को उसकी इस व्यर्थ ज़िद के लिए फटकार रहा हूँ।
5
सर तलक आब-ए-तेग़ में हूँ ग़र्क़
अब तईं आब आब करता हूँ
मैं तलवार की धार की चमक में सिर तक डूबा हुआ हूँ। इस डूबने के बावजूद, मैं अब भी पानी-पानी पुकार रहा हूँ, जो प्रेम की कभी न मिटने वाली प्यास को दर्शाता है।
6
जी में फिरता है 'मीर' वो मेरे
जागता हूँ कि ख़्वाब करता हूँ
मेरे अस्तित्व में 'मीर' घूमता है, हे मेरे प्रिय, क्या मैं जीवित हूँ या केवल एक सपने में हूँ।
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