बहस करता हूँ हो के अबजद-ख़्वाँ
किस क़दर बे-हिसाब करता हूँ
“I argue with the alphabet-lover now, How immeasurably I count it.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
वर्णमाला सीखने वाले एक शुरुआती छात्र की तरह होने के बावजूद, मैं बहस करता हूँ। मैं कितनी बेहिसाब और अत्यधिक बहस करता हूँ।
विस्तार
यह शेर आत्म-जागरूकता और अत्यधिक चिंतन की पराकाष्ठा को बयां करता है। शायर कहते हैं कि मैं बहस करता हूँ... और मैं यह जानना चाहता हूँ कि मेरी यह बहस, यह चर्चा, किस हद तक बे-हिसाब है। यह उस व्यक्ति की उलझन है जो अपने ही दिमाग के सैलाब को नियंत्रित नहीं कर पाता। यह महज़ बात करना नहीं, यह खुद को समझने का एक गहरा एहसास है।
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