ग़ज़ल

मिरा राज़-ए-दिल आश्कारा नहीं

مرا راز دل آشکارا نہیں
मीर अनीस· Ghazal· 8 shers· radif: नहीं

यह ग़ज़ल अंतर्मन के अनकहे रहस्यों, अद्वितीयता और असीम भावुकता को रेखांकित करती है। स्वयं को एक अंतहीन दरिया और अप्रकट सुगंध के रूप में प्रस्तुत करते हुए कवि ने गहन आत्मनिरीक्षण और रहस्यमयी भाव को व्यक्त किया है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
मिरा राज़-ए-दिल आश्कारा नहीं वो दरिया हूँ जिस का किनारा नहीं
मेरे दिल का राज़ किसी पर ज़ाहिर नहीं है; मैं एक ऐसा दरिया हूँ जिसका कोई किनारा नहीं है।
2
वो गुल हूँ जुदा सब से है जिस का रंग वो बू हूँ कि जो आश्कारा नहीं
मैं वह फूल हूँ जिसका रंग सबसे अलग है, और मैं वह खुशबू हूँ जो किसी पर ज़ाहिर या प्रकट नहीं है।
3
वो पानी हूँ शीरीं नहीं जिस में शोर वो आतिश हूँ जिस में शरारा नहीं
मैं वह मीठा पानी हूँ जिसमें कोई शोर नहीं है, और मैं वह आग हूँ जिसमें कोई चिंगारी नहीं है।
4
बहुत ज़ाल-ए-दुनिया ने दीं बाज़ियाँ मैं वो नौजवाँ हूँ जो हारा नहीं
इस बूढ़ी दुनिया ने मुझे हराने के लिए कई चालें चलीं, लेकिन मैं वह नौजवान हूँ जो कभी नहीं हारा।
5
जहन्नम से हम बे-क़रारों को क्या जो आतिश पे ठहरे वो पारा नहीं
हम बेचैन लोगों का नरक (जहन्नम) से क्या वास्ता, क्योंकि जो आग पर स्थिर रह जाए वह पारा नहीं हो सकता।
6
फ़क़ीरों की मज्लिस है सब से जुदा अमीरों का याँ तक गुज़ारा नहीं
फ़क़ीरों की महफ़िल सब से अलग होती है; यहाँ दौलतमंद लोगों का गुज़ारा या निर्वाह मुमकिन नहीं है।
7
सिकंदर की ख़ातिर भी है सद्द-ए-बाब जो दारा भी हो तो मदारा नहीं
सिकंदर जैसे महान विजेता के लिए भी दरवाज़ा बंद रहता है, और अगर कोई दारा भी हो तो उसकी कोई ख़ातिरदारी या परवाह नहीं की जाती।
8
किसी ने तिरी तरह से ऐ 'अनीस' उरूस-ए-सुख़न को सँवारा नहीं
ऐ अनीस, शायरी रूपी दुल्हन को किसी ने भी तुम्हारी तरह नहीं सँवारा है।
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