ग़ज़ल
ख़ुद नवेद-ए-ज़िंदगी लाई क़ज़ा मेरे लिए
خود نوید زندگی لائی قضا میرے لیے
यह ग़ज़ल मृत्यु को जीवन के दुखों से मुक्ति और अमरता का साधन मानती है। इसमें जीवन भर अपनों द्वारा की गई उपेक्षा और मरणोपरांत उनके व्यर्थ विलाप पर गहरी उदासी और विडंबना व्यक्त की गई है।
Source: rekhta · HI
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1
ख़ुद नवेद-ए-ज़िंदगी लाई क़ज़ा मेरे लिए
शम-ए-कुश्ता हूँ फ़ना में है बक़ा मेरे लिए
मौत स्वयं मेरे लिए जीवन का शुभ संदेश लेकर आई है; मैं एक बुझी हुई शमा हूँ और मेरे मिट जाने (फ़ना होने) में ही मेरी अमरता (बक़ा) छिपी है।
2
ज़िंदगी में तो न इक दम ख़ुश किया हँस बोल कर
आज क्यूँ रोते हैं मेरे आश्ना मेरे लिए
ज़िंदगी में तो मेरे दोस्तों ने कभी हँस-बोलकर मुझे एक पल के लिए भी ख़ुश नहीं किया, तो फिर आज वे मेरे लिए क्यों रो रहे हैं?
3
कुंज-ए-उज़्लत में मिसाल-ए-आसिया हूँ गोशा-गीर
रिज़्क़ पहुँचाता है घर बैठे ख़ुदा मेरे लिए
मैं तन्हाई के कोने में चक्की की तरह एक जगह बैठा रहता हूँ, और ख़ुदा मुझे घर बैठे ही रोज़ी पहुँचा देता है।
4
तू सरापा अज्र ऐ ज़ाहिद मैं सर-ता-पा गुनाह
बाग़-ए-जन्नत तेरी ख़ातिर कर्बला मेरे लिए
हे तपस्वी, तुम सिर से पाँव तक पुण्य और सवाब का स्वरूप हो जबकि मैं पूरी तरह पापों से भरा हूँ; इसलिए स्वर्ग का बाग़ तुम्हारे लिए है और कर्बला का मार्ग मेरे लिए है।
5
नाम रौशन कर के क्यूँकर बुझ न जाता मिस्ल-ए-शम्अ'
ना-मुवाफ़िक़ थी ज़माने की हवा मेरे लिए
अपना नाम रौशन करके मैं शमा की तरह कैसे न बुझ जाता, क्योंकि इस ज़माने की हवा मेरे अनुकूल नहीं थी।
6
हर नफ़स आईना-ए-दिल से ये आती है सदा
ख़ाक तू हो जा तो हासिल हो जिला मेरे लिए
हर सांस के साथ दिल के आईने से यह आवाज़ आती है कि तू ख़ाक (मिट्टी) बन जा, ताकि मेरे लिए चमक और निखार हासिल हो सके।
7
ख़ाक से है ख़ाक को उल्फ़त तड़पता हूँ 'अनीस'
कर्बला के वास्ते मैं कर्बला मेरे लिए
अनीस कहते हैं कि मिट्टी को मिट्टी से ही लगाव होता है और वह तड़पते हैं, क्योंकि वह कर्बला के लिए हैं और कर्बला उनके लिए है।
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