ग़ज़ल

कबीर संग्रह 61-70

کبیر سنگرہ 61-70
कबीर· Ghazal· 10 shers

कबीर संग्रह 61-70 के ये पद सच्चे प्रेम और आध्यात्मिक सुमिरन के गहरे स्वरूप का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि सच्चा प्रेम परम त्याग की माँग करता है, जिसका प्रतीक अपना शीश अर्पित करना है, और यह न तो खरीदा जा सकता है और न ही लालची व्यक्ति इसे पा सकता है। इसके अतिरिक्त, ये पद साधकों को गहन आंतरिक ध्यान की ओर निर्देशित करते हैं, बाहरी विकर्षणों को शांत करके केंद्रित सुमिरन के माध्यम से अपनी आंतरिक चेतना को जगाने का आग्रह करते हैं।

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लिपि व अर्थ
1
प्रेम न बड़ी ऊपजै , प्रेम न हाट बिकाय। राजा-प्रजा जोहि रुचें , शीश देई ले जाय॥
प्रेम न बड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय। राजा-प्रजा जोहि रुचें, शीश देई ले जाय॥ इसका अर्थ है कि प्रेम को न तो उगाया जा सकता है और न ही बाज़ार में बेचा जा सकता है। जो भी राजा या प्रजा को प्रेम चाहिए, वह अपना सिर देकर ले जा सकता है।
2
प्रेम प्याला जो पिये , शीश दक्षिणा देय। लोभी शीश न दे सके , नाम प्रेम का लेय॥
जो व्यक्ति प्रेम का प्याला पीता है, वह अपना शीश दक्षिणा के रूप में देता है। लोभी व्यक्ति प्रेम के नाम पर भी अपना शीश नहीं दे सकता।
3
सुमिरन में मन लाइए , जैसे नाद कुरंग। कहैं कबीर बिसरे नहीं , प्रान तजे तेहि संग॥
सुमिरन में मन को ऐसे लगाओ, जैसे मन को बांसुरी की ध्वनि में लगाना चाहिए। कबीर कहते हैं कि जीवन छोड़कर जाने के बाद भी उसका स्मरण मत करना।
4
सुमरित सुरत जगाय कर , मुख के कछु न बोल। बाहर का पट बन्द कर , अन्दर का पट खोल॥
सुमरित सूरत से हृदय को जगाओ, पर मुख से कुछ मत कहो। बाहरी आवरण को बंद करो और आंतरिक को खोल दो।
5
छीर रूप सतनाम है , नीर रूप व्यवहार। हंस रूप कोई साधु है , सत का छाननहार॥
शुद्ध नाम का रूप दूध जैसा है, और व्यवहार का रूप पानी जैसा है। कोई साधु हंस के समान होता है, जो सत्य को छानता है।
6
ज्यों तिल मांही तेल है , ज्यों चकमक में आग। तेरा सांई तुझमें , बस जाग सके तो जाग॥
जैसे तिल में मूँग का तेल होता है, और चकमक में आग। तुम्हारा साया तुझमें है; अगर वह जाग सके तो जाग जाए।
7
जा करण जग ढ़ूँढ़िया , सो तो घट ही मांहि। परदा दिया भरम का , ताते सूझे नाहिं॥
जो संसार मैंने बाहर खोजा, वह तो वास्तव में इसी हृदय में विद्यमान है। परन्तु तुमने भ्रम का पर्दा डाल दिया है, जिसके कारण उसे देखा नहीं जा रहा है।
8
जबही नाम हिरदे घरा , भया पाप का नाश। मानो चिंगरी आग की , परी पुरानी घास॥
जब भी हृदय में नाम लिया जाता है, पाप का नाश हो जाता है। यह वैसा ही है जैसे आग की एक चिंगारी पुरानी घास पर गिरती है।
9
नहीं शीतल है चन्द्रमा , हिंम नहीं शीतल होय। कबीरा शीतल सन्त जन , नाम सनेही सोय॥
चंद्रमा और हिम दोनों शीतल नहीं हैं। कबीर कहते हैं कि शीतल संत जन और प्रेममय नाम ही असली शीतलता है।
10
आहार करे मन भावता , इंदी किए स्वाद। नाक तलक पूरन भरे , तो का कहिए प्रसाद॥
जब मन भोग की लालसा करता है और स्वाद की चाह होती है, यदि नाक से लेकर पूरन से भर जाए, तो प्रसाद को क्या कहा जाए।
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कबीर संग्रह 61-70 | Sukhan AI