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आहार करे मन भावता , इंदी किए स्वादनाक तलक पूरन भरे , तो का कहिए प्रसाद73

When the mind craves enjoyment, and the taste is desired, If the nose is filled to the brim, what can be offered as grace?

कबीर
अर्थ

जब मन भोग की लालसा करता है और स्वाद की चाह होती है, यदि नाक से लेकर पूरन से भर जाए, तो प्रसाद को क्या कहा जाए।

विस्तार

कबीर दास जी यहाँ कितनी ख़ूबसूरती से समझा रहे हैं कि जब हमारा मन और हमारी सारी इंद्रियाँ दुनियावी चीज़ों और सुखों में पूरी तरह लिप्त हो जाती हैं, तो फिर भला आत्मा के लिए कोई जगह कहाँ बचती है! वो कह रहे हैं कि अगर हम अपनी सारी इच्छाओं से ही भरे रहेंगे, तो ईश्वर की कृपा या प्रसाद भला कहाँ से मिलेगा? यह हमें याद दिलाता है कि रूहानी सुकून के लिए हमें अपने भीतर थोड़ी खाली जगह बनानी पड़ती है, ताकि दैवीय आशीर्वाद हम तक पहुँच सके।

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