“He who drinks the cup of love, gives his head as offering. The greedy cannot give their head, even if they take the name of love.”
जो व्यक्ति प्रेम का प्याला पीता है, वह अपना शीश दक्षिणा के रूप में देता है। लोभी व्यक्ति प्रेम के नाम पर भी अपना शीश नहीं दे सकता।
मेरे दोस्त, कबीर इस दोहे में प्रेम के असली मायने समझा रहे हैं। वे कहते हैं कि प्रेम का प्याला पीना आसान नहीं, इसके लिए हमें अपना 'शीश' यानी अपना अहंकार और अपनी सारी पहचान दक्षिणा में देनी पड़ती है। यह सिर्फ़ कहने की बात नहीं, बल्कि अपने 'मैं' को पूरी तरह मिटा देने की बात है। जो व्यक्ति लोभी होता है, जो अपने स्वार्थ या दुनियावी चीज़ों से चिपका रहता है, वह यह बलिदान कभी नहीं दे सकता, चाहे वह कितनी भी प्रेम की बातें क्यों न करे। सच्चा प्रेम तो संपूर्ण समर्पण और निस्वार्थता की मांग करता है।
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